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सजा, तय करते समय कानून का कैसे पालन करना है: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी दोषी के खिलाफ लंबे समय तक समान प्रकार की किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता, तो यह सजा तय करते समय एक महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू हो सकता है।

24 जून 2026 को 09:38 am बजे
सजा, तय करते समय कानून का कैसे पालन करना है: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सौजन्य से:- Live Law Hindi

लंबे समय तक दोबारा अपराध न करना सजा तय करने में महत्वपूर्ण पहलू: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की सजा घटाई

Amir Ahmad

24 Jun 2026 12:45 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी दोषी के खिलाफ लंबे समय तक समान प्रकार की किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता, तो यह सजा तय करते समय एक महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू हो सकता है।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक दोषी की सजा में राहत दी और उसकी सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित किया।

मामला एक जाली राजस्व दस्तावेज का उपयोग कर न्यायिक कार्यवाही में जमानतदार बनने से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार आरोपी ने फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर निचली अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 467, 468 और 471 के तहत दोषी ठहराया।

इन धाराओं के अंतर्गत आरोपी को प्रत्येक अपराध के लिए पांच-पांच वर्ष के कठोर कारावास और प्रत्येक मद में एक-एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया।

बाद में हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट में दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी गई, बल्कि केवल सजा की अवधि कम करने की मांग की गई।

आरोपी की ओर से कहा गया कि वह आदतन अपराधी नहीं है और न ही उसके खिलाफ किसी अन्य आपराधिक मामले का रिकॉर्ड है। साथ ही घटना के बाद भी उसके खिलाफ किसी समान अपराध में शामिल होने का कोई आरोप सामने नहीं आया है। इसलिए मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए सजा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी आदतन अपराधी है या घटना से पहले अथवा बाद में किसी समान आपराधिक गतिविधि में शामिल रहा हो।

पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी वर्ष 2014 से आपराधिक मुकदमेबाजी की प्रक्रिया से गुजर रहा है और एक दशक से अधिक समय तक न्यायिक कार्यवाही का सामना कर चुका है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा,

"लंबे समय तक समान प्रकार के किसी अन्य अपराध में शामिल होने का कोई प्रमाण न होना, सजा निर्धारित करते समय एक प्रासंगिक कारक है।"

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि सजा तय करते समय अदालत को अपराध की प्रकृति, मामले की परिस्थितियों, आरोपी की भूमिका, जेल में बिताई गई अवधि, समय के अंतराल तथा अन्य शमनकारी परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना होता है।

पीठ ने कहा कि सजा निर्धारण की प्रक्रिया में समानुपातिकता का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। सजा को केवल प्रतिशोधात्मक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता, बल्कि मामले के समग्र तथ्यों और आरोपी की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित किया।

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