सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गुस्से में दी गई गाली से नहीं बनता अश्लीलता का मामला
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हर गाली-गलौज को अश्लीलता नहीं माना जा सकता, इसके लिए शब्दों की प्रकृति और उनके असर को साबित करना जरूरी है। इस फैसले के साथ ही अदालत ने जमीन विवाद से जुड़े एक मामले में अश्लीलता और धमकी के आरोप हटा दिए।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हर गाली-गलौज को अश्लीलता नहीं माना जा सकता, इसके लिए शब्दों की प्रकृति और उनके असर को साबित करना जरूरी है। जमीन विवाद से जुड़े मामले में कोर्ट ने अश्लीलता और धमकी के आरोप हटाए, लेकिन गंभीर चोट पहुंचाने की सजा बरकरार रखी।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि किसी व्यक्ति की ओर से इस्तेमाल की गई गाली-गलौज या भद्दी भाषा अपने आप में अश्लीलता का अपराध नहीं बन जाती। अदालत ने कहा कि अश्लीलता साबित करने के लिए यह जरूरी है कि शब्द कामुक हों, यौन भावनाएं भड़काने वाले हों और उन्हें सुनने या देखने वालों को बिगाड़ने या भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखते हों।
गाली-गलौज और अश्लीलता में अंतर बताया
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि कोई भी आपत्तिजनक, असभ्य या अपमानजनक भाषा कानून की नजर में अश्लील नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल गाली देने या अपशब्दों का इस्तेमाल करने से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294(b) के तहत अश्लीलता का अपराध साबित नहीं होता।
अदालत ने कहा कि ऐसे शब्द भले ही लोगों में गुस्सा, नफरत या असहजता पैदा कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर उन्हें कानूनी रूप से अश्लील नहीं माना जा सकता।
जमीन विवाद में गालियों के मामले पर आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक मामले की सुनवाई के दौरान कर रहा था। इस मामले में आरोपी मणि पर जमीन विवाद के दौरान शिकायतकर्ता को बेहद आपत्तिजनक गालियां देने और धमकी देने का आरोप था।
आरोप था कि विवाद के दौरान आरोपी ने मां की गाली और कुछ अपशब्दों का इस्तेमाल किया था, जिसके आधार पर उसे IPC की धारा 294(b) के तहत अश्लीलता का दोषी ठहराया गया था।
कोर्ट ने कहा- शब्दों के साथ परिस्थिति भी देखनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी भाषा या शब्द को अश्लील मानने के लिए उसके संदर्भ और प्रभाव को देखना जरूरी है। केवल अपमानजनक या गाली भरे शब्दों को अश्लीलता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
बेंच ने कहा कि IPC की धारा 294(b) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह भी दिखाना जरूरी है कि इस्तेमाल किए गए शब्दों से सार्वजनिक स्थान पर किसी व्यक्ति को परेशानी हुई हो। इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया।
धारा 294(b) की दोषसिद्धि रद्द की
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अश्लीलता से जुड़ी दोषसिद्धि को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के आरोपों को सही मानने के बाद भी इस्तेमाल किए गए शब्द केवल गाली-गलौज और अपशब्दों की श्रेणी में आते हैं, न कि कानूनी अर्थों में अश्लीलता के दायरे में।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी बहस के दौरान बोले गए अपशब्दों को तभी अपराध माना जा सकता है, जब वे कानून में तय अश्लीलता की कसौटी पर खरे उतरें।
धमकी के आरोप से भी मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 506(ii) यानी आपराधिक धमकी के आरोप को भी रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल धमकी भरे शब्द बोल देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी का उद्देश्य पीड़ित में डर पैदा करना था या उसे किसी खास काम के लिए मजबूर करना था।
गंभीर चोट के मामले में दोष बरकरार
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को गंभीर चोट पहुंचाने यानी IPC की धारा 326 के तहत दोषी माना। अदालत ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट से शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूटने की पुष्टि हुई थी और हमला बिलहुक (एक प्रकार के धारदार कृषि औजार) से किया गया था। कोर्ट ने माना कि यह गंभीर चोट की श्रेणी में आता है और इस मामले में दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
70 साल उम्र को देखते हुए सजा कम की
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की उम्र करीब 70 साल होने, स्वास्थ्य स्थिति और घटना के पुराने होने को ध्यान में रखते हुए सजा में राहत दी। अदालत ने उसकी सजा को घटाकर 'अदालत उठने तक की कैद' कर दिया और उसे दो महीने के भीतर 50 हजार रुपये का जुर्माना जमा करने का निर्देश दिया। यह मामला अगस्त 2017 में तमिलनाडु में कृषि भूमि विवाद से जुड़ा था, जिसमें बहस के बाद आरोपी पर हमला करने और गंभीर चोट पहुंचाने के आरोप लगे थे।
लेखक के बारे मेंअशोक उपाध्यायअशोक उपाध्याय, नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का 12 साल का अनुभव। साल 2014 में नवभारत टाइम्स हिंदी अखबार से पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की थी। पॉलिटिक्स और क्राइम बीट पर रिपोर्टिंग का काफी अनुभव है। अमर उजाला देहरादून में भी सेंट्रल डेस्क पर काम किया है। साथ ही कई चुनावों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की है। पिछले 6 साल से NBT डिजिटल में न्यूज डेस्क पर काम कर रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स को पकड़ने की अच्छी समझ है।
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पत्रकारिता अनुभव: प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 12 साल से कार्यरत हैं।
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