सुप्रीम कोर्ट ने भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका सुनवाई से इनकार किया
बिहार के भोजपुर में भरत भूषण तिवारी की कथित न्यायेतर हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जबकि याचिकाकर्ता को पटना हाईकोर्ट जाने की छूट दी गई।

सौजन्य से:- The Wire - Hindi
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (30 जून) को बिहार के भोजपुर में भरत भूषण तिवारी की कथित न्यायेतर हत्या मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पटना हाईकोर्ट जाने की छूट दी है.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, वकील विशाल तिवारी द्वारा दाखिल इस जनहित याचिका में एनकाउंटर की जांच सीबीआई से कराने और जांच के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग की गई थी.
उल्लेखनीय है कि इस एनकाउंटर के संबंध में पुलिस के दावे पर भरत तिवारी के परिवार ने सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि गोली लगने से पहले ही उन्होंने अपना हथियार फेंक कर आत्मसमर्पण कर दिया था.
इस मामले के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदेश और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा, ‘हम इस याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं. याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट जाने की छूट दी जाती है.’
वहीं, विशाल तिवारी ने तर्क दिया कि इस मामले में मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन हुआ है. उन्होंने कहा कि पुलिस ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले में तय किए गए सुरक्षा उपायों का पालन करने में विफल रही है. इस फैसले में पुलिस एनकाउंटर में हुई मौतों और गंभीर चोट वाले मामलों की जांच के लिए दिशानिर्देश दिए गए थे.
उन्होंने कहा, ‘हाईकोर्ट में पहले से ही याचिकाएं लंबित हैं. इसके अलावा इस माननीय कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया… इसमें सीधे तौर पर मौलिक अधिकार शामिल हैं.’
हालांकि, पीठ ने याचिकाकर्ता के मुकदमा करने के अधिकार (लोकस स्टैंडी) पर सवाल उठाया. जस्टिस सुंदेश ने पूछा, ‘आप कौन हैं?’ तब विशाल तिवारी ने जवाब दिया कि उन्होंने जनहित में कोर्ट का रुख किया है, इस पर बेंच की ओर से कहा गया कि इस मामले का उचित उपाय हाईकोर्ट के पास ही है.
बेंच ने कहा, ‘कृपया हाईकोर्ट जाएं क्योंकि वह इस मामले की बेहतर तरीके से निगरानी कर सकता है.’
अपनी याचिका में वकील तिवारी ने तर्क दिया था कि एक संवैधानिक लोकतंत्र में पुलिस सज़ा देने वाली अथॉरिटी की भूमिका नहीं निभा सकती, क्योंकि अपराध तय करने और सज़ा देने का अधिकार पूरी तरह से न्यायपालिका के पास है.
इस एनकाउंटर का ज़िक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि भरत तिवारी की मौत से जुड़े हालात ‘संदिग्ध’ लग रहे थे और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.
याचिका में कहा गया, ‘पिछले कुछ सालों में न्यायेतर हत्याओं के मामले बढ़ रहे हैं, जो कानून के शासन के लिए एक बड़ी चुनौती है.’
इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि हाल के महीनों में पूरे बिहार में पुलिस एनकाउंटर में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. याचिका में केंद्र सरकार से यह निर्देश देने की भी मांग की गई थी कि वह सभी राज्यों को उनके मुख्य सचिवों के ज़रिए एक एडवाइजरी जारी करे, जिससे ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में तय किए गए सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित किया जा सके.
गौरतलब है कि बीते 17 जून को एक कथित पुलिस एनकाउंटर में भरत तिवारी की मौत हो गई थी. इससे एक दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वे देसी पिस्तौल लहराते और भोजपुर ज़िले में पुलिसवालों से अपना गांव छोड़ने के लिए कहते हुए दिख रहे थे.
इस घटना के बाद अलग-अलग दलों के नेता और स्थानीय लोग घटनास्थल पर जमा हुए और आरोप लगाया गया कि यह मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी. इसके बाद बिहार सरकार ने कई पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया. इस मामले में पांच पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई है.
साथ ही जांच के लिए पटना हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया है. यह आयोग बिहार में एनडीए सरकार द्वारा 24 जून को उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई राज्य कैबिनेट बैठक के बाद बनाया गया था; इस बैठक में घटना की स्वतंत्र जांच के लिए कानून विभाग के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई थी.
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