हाईकोर्ट का फैसला: पत्रकार तरुण तेजपाल को यौन उत्पीड़न मामले में दोषी ठहराया, 10 साल की जेल
गोवा पीठ ने तेजपाल को 10 साल की जेल की सज़ा सुनाई, दोषी करार दिया गया है उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एफ) और (के), 354ए और 354बी के तहत दोषी ठहराया गया है।

सौजन्य से:- The Wire - Hindi
नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने पत्रकार और ‘तहलका’ पत्रिका के प्रधान संपादक रहे तरुण तेजपाल को वर्ष 2013 में अपनी जूनियर सहयोगी के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी मानते हुए गुरुवार (6 अगस्त) को 10 साल की जेल की सज़ा सुनाई है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने गोवा सरकार की ओर से दाख़िल अपील को मंज़ूर करते हुए सत्र न्यायालय के साल 2021 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तेजपाल को इन आरोपों से बरी कर दिया गया था. इसके साथ ही जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जमसंडेकर की पीठ ने तेजपाल को दो हफ़्तों के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है.
बार एंड बेंच के अनुसार, अदालत ने कहा, ‘हमने निचली अदालत के फैसले और आदेश को रद्द कर दिया है और तेजपाल को दोषी ठहराया है. हमने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एफ) और (के), 354ए और 354बी के तहत दोषी ठहराया है.’
उल्लेखनीय है कि धारा 354ए यौन उत्पीड़न को अपराध मानती है. इसमें अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन संबंध बनाने के स्पष्ट संकेत, या सेक्सुअल फेवर शामिल हो सकते हैं. वहीं, धारा 354बी किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उस पर हमला करने या आपराधिक मंशा से बल प्रयोग करने को अपराध मानती है.
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान गोवा सरकार ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट का फैसला पक्षपातपूर्ण था. सरकार का कहना था कि सत्र अदालत ने आरोपी के आचरण की बजाय शिकायतकर्ता के चरित्र और घटना के बाद उसके व्यवहार पर अनुचित रूप से ज़्यादा ज़ोर दिया.
वहीं, तेजपाल की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता का बयान सुरक्षा कैमरों के फुटेज और लिफ्ट की कार्यप्रणाली से जुड़े साक्ष्यों से मेल नहीं खाता.
दोषसिद्धि के बाद तेजपाल के वकील ने सज़ा तय करते समय नरमी बरतने की अपील करते हुए कहा कि यह घटना 13 साल पुरानी है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के लिए दोषसिद्धि के आदेश पर कम-से-कम दो महीने की रोक लगाने की भी मांग की. इस पर राज्य की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि इस मामले में ‘एक मिसाल कायम की जानी चाहिए.’
मेहता ने अदालत से कहा कि समाज को स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि ‘जब कोई लड़की ‘न’ कहती है, तो उसका मतलब ‘न’ ही होता है.’
गौरतलब है कि तरुण तेजपाल पर 2013 में गोवा के पांच सितारा होटल की लिफ्ट में अपनी सहकर्मी का यौन शोषण करने का आरोप लगा था. यह घटना तब की है जब वह एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गोवा गए थे.
उन्हें 30 नवंबर 2013 को गिरफ़्तार कर लिया गया था और सात महीने बाद जुलाई में जेल से रिहा कर दिया गया. बाद में वे अपने ख़िलाफ़ लगे आरोपों को ख़ारिज कराने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट गए लेकिन उस समय कामयाब नहीं हो सके.
इस मामले में गोवा पुलिस ने लगभग तीन हज़ार पन्नों का आरोपपत्र दायर किया था. जिसमें तेजपाल पर ‘गलत तरीके से नियंत्रण, गलत तरीके से बंधक बनाने, यौन उत्पीड़न, हमला, पद का दुरुपयोग करके यौन शोषण’ जैसे आरोप लगाए गए थे.
तरुण तेजपाल ने सभी आरोपों से इनकार किया था और ख़ुद को बेकसूर बताया था. अभियोजन पक्ष ने 156 गवाहों की सूची सामने रखी थी, लेकिन आख़िर में लगभग 70 के साथ जिरह हुई.
साल 2021 में गोवा की मापुसा सत्र अदालत ने तेजपाल को बरी करते हुए पीड़िता के आचरण पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उनके बर्ताव में ऐसा कुछ नहीं दिखा जिससे लगे कि वह यौन शोषण की पीड़िता हैं.
गोवा की एक निचली अदालत ने पत्रकार तरुण तेजपाल को यौन उत्पीड़न के मामले में बरी करते हुए संदेह का लाभ देते हुए कहा था कि शिकायतकर्ता महिला द्वारा लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई सबूत मौजूद नहीं हैं.
फैसले में कहा गया कि सर्वाइवर ने ‘ऐसा कोई भी मानक व्यवहार’ प्रदर्शित नहीं किया, जैसा ‘यौन उत्पीड़न की कोई पीड़ित करती’ हैं.
यह कहते हुए कि इस बात का कोई मेडिकल प्रमाण नहीं है और शिकायतकर्ता की ‘सच्चाई पर संदेह पैदा करने’ वाले ‘तथ्य’ मौजूद हैं, अदालत के आदेश में कहा गया कि महिला द्वारा आरोपी को भेजे गए मैसेज ‘यह स्पष्ट रूप से स्थापित’ करते हैं कि न ही उन्हें कोई आघात पहुंचा था न ही वह डरी हुई थीं, और यह अभियोजन पक्ष के मामले को ‘पूरी तरह से झुठलाता है.’
जज ने उस माफीनामे वाले ईमेल की भी अवहेलना की, जिसे तेजपाल ने घटना के बाद पीड़िता को भेजा था और कहा कि ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया था.
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