भ्रष्टाचार के आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कानून बेगुनाहों के लिए ढाल का हो न कि तलवार का
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून को बेगुनाहों के लिए ढाल का काम करना चाहिए, न कि तलवार का। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने ओडिशा के एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला रद्द कर दिया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
कानून को बेगुनाहों के लिए ढाल का काम करना चाहिए, न कि तलवार का: सुप्रीम कोर्ट
Edited by: रुचिर शुक्ला|टाइम्स न्यूज नेटवर्क•
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून को बेगुनाहों के लिए ढाल का काम करना चाहिए, न कि तलवार का। पूरा मामला एक सरकारी अधिकारी से जुड़ा है, जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
जान लीजिए पूरा मामला क्या है
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने कहा कि अस्पष्ट बयानों के आधार पर मुकदमे की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। बेंच ने ओडिशा के एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला यह देखते हुए रद्द कर दिया कि उन पर कोई ठोस आरोप नहीं था। बेंच ने कहा कि यह कोर्ट इस व्यापक विचार से भी सहमत है कि आपराधिक प्रक्रिया को उत्पीड़न का जरिया नहीं बनने दिया जाना चाहिए।'कोर्ट का फर्ज है कि वह..'
पीठ ने कहा कि कानून को बेगुनाहों के लिए ढाल का काम करना चाहिए, न कि बदला लेने की भावना रखने वालों के हाथों में तलवार का। जहां उपलब्ध सामग्री से किसी अपराध के होने का पता न चले, वहां कोर्ट का फर्ज है कि वह कार्यवाही को शुरुआती चरण में ही इसे रोक दे। आपराधिक मुकदमा कोई मामूली औपचारिकता या केवल रस्म-अदायगी नहीं है जिसे बिना मेरिट के भी झेलना पड़े।कानून के तहत ऐसा करना मंजूर नहीं: SC
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे की कार्यवाही शुरू करने से पहले स्पष्ट और ठोस सामग्री होनी चाहिए जिससे पता चले कि आरोपी ने अपराध किया हो सकता है। सर्वोच्च अदालत ने पाया कि सरकारी अधिकारी पर लगाया गया आरोप इतना व्यापक था कि उसमें कई लोगों को फंसाया जा सकता था, बिना यह देखे कि किसने क्या काम किया या किसकी क्या गलती थी; कानून के तहत ऐसा करना मंजूर नहीं है। हमारी राय है कि आरोपी के खिलाफ किसी साफ काम या ठोस आरोप के बिना, केवल सामान्य आरोपों के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।कन्वर्सेशन शुरू करें
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