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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यपाल की शक्ति सर्वोपरि, सरकार नहीं छीन सकती सजा में छूट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजभवन के अधिकार के तहत बनी समय पूर्व रिहाई की नीति को सरकार द्वारा बाद में बनाई गई कोई भी नीति रद्द नहीं कर सकती है। इसका मतलब है कि सरकारें इस नीति का लाभ पहले से ही मौजूद अधिकारियों तक नहीं पहुंचा सकती हैं।

3 जुलाई 2026 को 04:24 am बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यपाल की शक्ति सर्वोपरि, सरकार नहीं छीन सकती सजा में छूट

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों से बनी रिमिशन (सजा में छूट) नीति को बाद में बनाई गई वैधानिक नीति से खत्म नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने हरियाणा सरकार को 2002 की नीति के तहत कैदी की समयपूर्व रिहाई की अर्जी पर चार हफ्ते में दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति के तहत बनी सजा में छूट नीति को बाद की वैधानिक नीति रद्द नहीं कर सकती। बुधवार को अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बनाई गई माफी/सजा में छूट (Remission) नीति को बाद में बनाई गई नीति से खत्म नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में यह कहा। उम्रकैद की सजा पाए कैदी की याचिका पर यह फैसला आया। उसकी समय से पहले रिहाई की अर्जी हरियाणा सरकार ने खारिज कर दी थी। सरकार ने कहा था कि उस पर वर्ष 2008 की रिमिशन नीति लागू होगी न कि वर्ष 2002 की अधिक लाभकारी नीति।

क्या है मामला?

याचिकाकर्ता को वर्ष 2019 में 12 वर्षीय बच्चे की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। उसने 14 साल से अधिक की वास्तविक जेल अवधि पूरी करने के बाद वर्ष 2002 की नीति के तहत रिहाई की मांग की थी। हरियाणा सरकार ने उसकी मांग यह कहते हुए खारिज कर दी कि दोषसिद्धि के समय वर्ष 2008 की नीति लागू थी, इसलिए उसे 20 साल की वास्तविक कैद और कुल 25 साल की सजा पूरी करने के बाद ही रिहाई पर विचार का लाभ मिलेगा। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी सरकार के फैसले को बरकरार रखा था।

अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की शक्ति स्वतंत्र

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2002 की नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि रिमिशन के मामलों को संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल के आदेश के लिए भेजा जाएगा। 2008 की नीति CrPC की धाराओं 432 और 433 के तहत बनाई गई थी, जिसमें वैधानिक प्रक्रिया के तहत मुख्यमंत्री की मंजूरी का प्रावधान था।

चार हफ्ते में दोबारा विचार का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह कैदी की रिहाई की अर्जी पर वर्ष 2002 की नीति के अनुसार चार हफ्ते के भीतर दोबारा विचार करे। फैसला भविष्य के मामलों पर लागू होगा और पहले से तय रिमिशन मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। हरियाणा में प्रभावी रूप से दो अलग-अलग रिमिशन नीतियां मौजूद रहेंगी और आगे की व्यवस्था तय करना राज्य सरकार का विषय होगा।

सरकार नहीं छीन सकेगी फायदा...

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब है कि राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों के तहत बनाई गई सजा में छूट (रिमिशन) नीति को बाद में बनी किसी वैधानिक नीति से खत्म नहीं किया जा सकता। इससे कैदियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। सरकारे बाद की नीति लागू कर पहले से उपलब्ध अधिक लाभकारी संवैधानिक रिमिशन का लाभ नहीं छीन सकेगी।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें

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