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सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेट डिटेक्टिवों को रेगुलेट करने और सुरक्षित माहौल बनाने की बात कही

सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों के कामकाज को रेगुलेट करने और जांच की शक्तियों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए कानूनी ढांचा बनाने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर्स के लिए प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स को तय करने और उन लोगों के अधिकारों का उल्लंघन होने पर उपाय करने की आवश्यकता है।

31 जुलाई 2026 को 04:15 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेट डिटेक्टिवों को रेगुलेट करने और सुरक्षित माहौल बनाने की बात कही

सौजन्य से:- Live Law Hindi

सुप्रीम कोर्ट ने दिया प्राइवेट डिटेक्टिव्स को रेगुलेट करने के लिए कानून बनाने का सुझाव

Shahadat

31 July 2026 8:05 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई) को केंद्र सरकार और भारत के विधि आयोग से प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों के कामकाज को रेगुलेट करने के लिए कानूनी ढांचा बनाने पर विचार करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि कानूनी सुरक्षा उपायों की कमी से प्राइवेसी के उल्लंघन और जांच की शक्तियों के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि ऐसे सिस्टम की तत्काल आवश्यकता है, जो प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर्स के लिए प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स तय करे। साथ ही उन लोगों के लिए उपाय भी बताए जिनके अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"शायद कानून, कानून लागू करने वाली एजेंसियों, प्राइवेसी एक्सपर्ट्स आदि के क्षेत्रों से ऐसे उपाय और नियम बनाने की ज़रूरत है, जो ऐसी कोशिशों से पैदा होने वाले मुद्दों से निपट सकें। इसमें किसी ऐसे व्यक्ति के लिए शिकायत निवारण मंच के रूप में काम करना भी शामिल है, जो किसी प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर के प्रोफेशनल सीमाओं को पार करने और व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले कार्यों से पीड़ित हो सकता है... ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए अपना सिस्टम विकसित करने की आवश्यकता पर जितना ज़ोर दिया जाए, कम है। विधायिका को ज़ाहिर तौर पर सभी संबंधित मुद्दों की अपनी जांच करनी होगी और मौजूदा नियमों और शर्तों के अनुसार नियम/विनियम बनाने होंगे, लेकिन वे उन अन्य जगहों का भी संदर्भ ले सकते हैं, जहां इसी तरह के कानून मौजूद हैं, उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड राज्य, कनाडा में ओंटारियो प्रांत, नीदरलैंड, सिंगापुर आदि।"

कोर्ट ने ये टिप्पणियां एक वैवाहिक विवाद पर फैसला करते हुए कीं, जिसमें पति ने पत्नी की कुछ तस्वीरें और वीडियो पेश किए, जिनमें कथित तौर पर उसके विवाहेतर संबंध दिखाए गए। कोर्ट ने अनुमान लगाया कि ये तस्वीरें किसी प्राइवेट डिटेक्टिव के ज़रिए हासिल की गई होंगी। इसके बाद कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या उन्हें रेगुलेट करने और ऐसे सबूतों की स्वीकार्यता तय करने के लिए कोई कानून है।

बेंच ने गौर किया कि हालांकि राज्यसभा में प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसीज़ (रेगुलेशन) बिल, 2007 पेश किया गया, लेकिन इसे कभी कानून का रूप नहीं दिया गया।

इसने नवीनचंद्र एन. मजीठिया बनाम मेघालय राज्य (2000) 8 SCC 323 मामले में तीन जजों की बेंच के फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों द्वारा की गई जांच को कानून के तहत जांच के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है। नतीजतन, ऐसी एजेंसियों द्वारा जुटाए गए सबूतों पर अभियोजन पक्ष भरोसा नहीं कर सकता, हालांकि बचाव पक्ष उन्हें पेश कर सकता है।

कोर्ट ने नवीनचंद्र एन. मजीठिया मामले का हवाला देते हुए कहा,

"कोड प्राइवेट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी को मान्यता नहीं देता है। अगर कोई व्यक्ति ऐसी किसी प्राइवेट एजेंसी की सेवा लेना चाहता है तो वह अपने जोखिम और खर्च पर ऐसा कर सकता है, लेकिन ऐसी जांच को कानून के तहत की गई जांच नहीं माना जाएगा। ऐसी प्राइवेट जांच में इकट्ठा किए गए सबूत और ऐसे इन्वेस्टिगेटर द्वारा निकाले गए किसी भी नतीजे को पब्लिक प्रॉसिक्यूटर किसी भी ट्रायल में पेश नहीं कर सकता है। बेशक, डिफेंस के लिए ऐसे सबूत पेश करना संभव हो सकता है।"

यह टिप्पणी एक पति द्वारा दायर अपील की सुनवाई के दौरान की गई, जो CrPC की धारा 125(4) के तहत अपनी अर्जी शुरुआती स्तर पर ही खारिज होने से परेशान था। पति ने अपनी पत्नी के अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) के दावे का विरोध करते हुए प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी के ज़रिए हासिल की गई तस्वीरें और वीडियो पेश किए, ताकि उसके कथित व्यभिचारी संबंध (Adulterous Relationship) को साबित किया जा सके।

कोर्ट ने पति की अपील मंज़ूरी देते हुए कहा कि पत्नी के व्यभिचारी आचरण के स्पष्ट सबूत (Ex Facie Evidence) मिलने पर उसे अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया जा सकता है। साथ ही कोर्ट ने प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों के कामकाज को रेगुलेट करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया, क्योंकि इसके लिए कोई कानून नहीं है।

इसके मद्देनजर, कोर्ट ने इस फैसले की एक कॉपी भारत सरकार के कानून और न्याय मंत्रालय के सचिव और भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) के अध्यक्ष को भेजने का निर्देश दिया, ताकि वे इस मामले में उचित कदम उठा सकें।

Cause Title: HIMANSHU CHORDIA VERSUS STATE OF RAJASTHAN & ANR.

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