सुप्रीम कोर्ट ने छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया जिसमें गोवा के मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा को हटाने का आदेश दिया गया था।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Mormugao Port Land Dispute Shivaji Statue: सुप्रीम कोर्ट ने गोवा के मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने संबंधी बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता अब बॉम्बे हाईकोर्ट फिर से जा सकते हैं।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गोवा स्थित मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा को हटाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। आपको बता दें कि गोवो के मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य मूर्ति को बड़े धूम धाम से स्थापित किया गया था। लेकिन इसके खिलाफ तभी से आवाजें उठने लगी थीं। 'तमिल राष्ट्र' की 60 साल पहले की गई मांग को नजरअंदाज कीजिए, यह 'देशद्रोह' नहीं, मद्रास हाई कोर्ट में मामला खारिज
शिवाजी की भव्य प्रतिमा का विवाद और बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश
यह मामला उस एक तरह से मराठियों के शिवाजी के प्रति श्रद्धा से जुड़ा तो हैं लेकिन इसमें कानून के उल्लंघन की भी बात जुड़ी है। पूरा विवाद शिवाजी की भव्य प्रतिमा से जुड़ा है जिसे गोवा में मोरमुगाओ पोर्ट अथॉरिटी की भूमि पर स्थापित किया गया था। इसके खिलाफ मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में पहुंचा तो तथ्यों पर ध्यान देते हुए हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने अप्रैल 2026 में इसे अवैध निर्माण मानते हुए हटाने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि प्रतिमा सार्वजनिक भूमि पर आवश्यक कानूनी अनुमति के बिना स्थापित की गई। अदालत ने राज्य सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। इसी आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई।
यह ज्यादा गंभीर बात है कि एक प्रमुख बंदरगाह की संपत्ति पर साफ रुप से अतिक्रमण की कार्रवाई महीनों चलती रही, महाराष्ट्र सरकार सब कुछ जानते हुए भी मौन साधे हुए, मूकदर्शक बनी रही। मामले में उसने अतिक्रमण करने वालों को रोकने के बजाय परोक्ष रूप से उनका साथ दिया।
बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति एम. एम. सुन्दरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की अवकाशकालीन पीठ ने की।
सुप्रीम कोर्ट मे हाईकोर्ट की टिप्मणियों पर ध्यान दिया, जिसमें साफ था कि संबंधित विभागों से वैधानिक अनुमति प्राप्त नहीं की गई थी, और सरकारी एजेंसियों ने समय रहते कार्रवाई नहीं की। हाईकोर्ट के फैसले में राज्य प्रशासन की निष्क्रियता पर भी टिप्पणी की गई थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संकेत दिया कि वह हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं देख रही है।
अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए हाईकोर्ट के समक्ष उचित आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस लेने का निर्णय लिया। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया
मामले में सबसे बड़ी चीज जो गौर करने लायक है, वह यह कि मामला केवल एक प्रतिमा तक सीमित नहीं है बल्कि सार्वजनिक भूमि पर निर्माण में वैधानिक स्वीकृतियों की जरूरत को भी सामने लाता है। यदि किसी सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर निर्माण किया जाता है तो संबंधित नियमों और अनुमति प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है। चाहे वह कोई भी हो। कानून के सामने सभी समान हैं। मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश अभी तक तो प्रभावी बना हुआ है। आगे की कार्यवाही अब हाईकोर्ट के समक्ष दायर होने वाले आवेदन पर निर्भर करेगी।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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