सुप्रीम कोर्ट ने व्यापारी संगठन को नोटिस से राहत नहीं दी, पुलिस के साथ सहयोग करने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने लॉ फर्म को पुलिस समन पर मुकदमा चलाने से रोके जाने की मांग से इंकार कर दिया। अदालत ने कुछ राहत देते हुए कहा कि फर्म को पुलिस के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रखना चाहिए।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
लॉ फर्म को पुलिस समन पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, वकील की गिरफ्तारी पर दो सप्ताह की राहत
Amir Ahmad
16 Jun 2026 6:31 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने लॉ फर्म को जारी पुलिस समन में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। हालांकि अदालत ने फर्म के एक वकील की गिरफ्तारी पर दो सप्ताह के लिए रोक लगाते हुए उन्हें राहत प्रदान की। साथ ही फर्म को पुलिस के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया गया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
यह याचिका लॉ फर्म 'द लीगल अटॉर्नीज एंड बैरिस्टर्स' की ओर से दायर की गई, जिसमें मद्रास हाइकोर्ट द्वारा उन्हें अवमानना कार्यवाही में पक्षकार बनाए जाने के आदेश को चुनौती दी गई।
मामला
मामला फीनिक्स एआरसी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर अवमानना याचिका से जुड़ा है। इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने समर्पणा चैरिटेबल ट्रस्ट की संपत्तियों को चेन्नई मेट्रो रेल लिमिटेड को बेचे जाने के सौदे को धोखाधड़ी पूर्ण बताते हुए निरस्त कर दिया था।
हाईकोर्ट ने माना था कि ट्रस्ट की संपत्तियों पर फीनिक्स एआरसी का पूर्व अधिकार है। अदालत ने यह भी पाया कि चेन्नई मेट्रो रेल लिमिटेड ने अधिग्रहित भूमि के बदले ट्रस्ट को लगभग 13.30 करोड़ रुपये का भुगतान किया।
इसके बाद अदालत ने सार्वजनिक धन के संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए मामले की जांच के निर्देश दिए।
अवमानना कार्यवाही के दौरान हाइकोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि लगभग 6.8 करोड़ रुपये लॉ फर्म 'द लीगल अटॉर्नीज एंड बैरिस्टर्स' के खाते में स्थानांतरित किए गए। इसके बाद फर्म को मामले में पक्षकार बनाया गया और चेन्नई केंद्रीय अपराध शाखा ने जांच के सिलसिले में उन्हें समन जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
फर्म की ओर से सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि वकीलों को समन जारी करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के मद्देनजर पुलिस की कार्रवाई उचित नहीं है। उन्होंने फर्म को अवमानना कार्यवाही में पक्षकार बनाए जाने पर भी आपत्ति जताई।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति नहीं जताई। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि फर्म की भूमिका की जांच होना आवश्यक है।
अदालत ने कहा,
“आपको क्यों नहीं बुलाया जा सकता? आपका आचरण हाईकोर्ट की जांच के दायरे में है। सात करोड़ रुपये के लेन-देन पर संदेह है। यह न्यायिक व्यवस्था के साथ गंभीर धोखाधड़ी का मामला प्रतीत होता है। हाईकोर्ट उचित कार्रवाई कर रहा है।”
फर्म की ओर से कहा गया कि उसने ट्रस्ट के लिए 69 मामलों में 600 से अधिक बार पैरवी की थी और प्राप्त राशि कानूनी सेवाओं के बदले थी।
इस पर अदालत ने कहा कि संबंधित खाते और दस्तावेज हाइकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
जब वकील ने मुवक्किल-वकील निजता का मुद्दा उठाया तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह तर्क हाईकोर्ट के समक्ष रखा जा सकता है।
गिरफ्तारी पर अंतरिम राहत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस समन को चुनौती देने के लिए फर्म हाईकोर्ट का रुख कर सकती है। साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि फर्म पुलिस जांच में सहयोग करे और अपना स्पष्टीकरण दे।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि फर्म से जुड़े वकील हुसैन मोईन फारूक के खिलाफ दो सप्ताह तक कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस अवधि में उन्हें आवश्यक राहत के लिए हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता रहेगी।
हालांकि फर्म के बैंक खातों को फ्रीज करने संबंधी कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया।
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