बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा: कई कानूनी शिकायतें दर्ज कराना आत्महत्या उकसाने का अपराध नहीं
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किसी पर बार‑बार मुकदमों या FIRs दर्ज कराना स्वाभाविक रूप से IPC धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। यह राय कांग्रेस कार्यकर्ता व वकील सदाशिव गायके के विरुद्ध दायर कई शिकायतों और पूर्व कांग्रेस सांसद सुरेश पाटिल की बाद में हुई आत्महत्या के बीच के संबंध को लेकर थी, जहाँ अदालत ने अभियोजक के इरादे और वास्तविक साक्ष्य को मुख्य मानते हुए कोई दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य नहीं पाया।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
कानून के तहत कई मुकदमे दर्ज कराने से आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता: बॉम्बे हाईकोर्ट
Amir Ahmad
28 Sept 2026 4:07 PM IST
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत लगातार कई शिकायतें या मुकदमे दर्ज कराना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बन जाता। केवल इसलिए शिकायतकर्ता पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती कि बाद में उस व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली, जिसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई।
औरंगाबाद पीठ में जस्टिस राजेश जोशी ने कांग्रेस कार्यकर्ता और वकील सदाशिव गायके के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। गायके पर पूर्व कांग्रेस सांसद सुरेश पाटिल को कथित तौर पर परेशान करने और उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज कराने के आरोप लगाए गए। पाटिल ने फरवरी 2019 में आत्महत्या कर ली थी।
अदालत ने पाया कि गायके ने करीब दो दशक के दौरान पाटिल के खिलाफ कई कानूनी कार्यवाही शुरू की। इनमें मुख्य रूप से जिला सहकारी बैंक के कामकाज से जुड़े मामले थे, जिसमें दोनों सदस्य थे। अदालत के अनुसार, शिकायतें बैंक में दोनों की व्यक्तिगत भूमिका से संबंधित हैं।
जस्टिस जोशी ने कहा कि यदि किसी संस्था के सदस्य या सक्षम व्यक्ति को कोई अनियमितता या कदाचार दिखाई देता है तो उसे कानून के तहत कार्यवाही शुरू करने का अधिकार है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि पाटिल को इन मामलों में संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया। हालांकि, बरी करने वाली अदालत ने गायके के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण मुकदमे शुरू करने या इसी तरह की कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की थी, जैसा कि पाटिल के परिवार की ओर से दावा किया गया।
11 सितंबर के अपने आदेश में जस्टिस जोशी ने कहा कि ऐसे मामलों में यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि शिकायतकर्ता का उद्देश्य क्या था और वह क्या हासिल करना चाहता था, न कि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति ने शिकायतकर्ता की कार्रवाई को किस रूप में देखा।
अदालत ने कहा कि यदि यह मान लिया जाए कि कानून के तहत लगातार कई कार्यवाही शुरू करना ही आत्महत्या के लिए उकसाना है तो इससे ऐसी स्थिति पैदा होगी, जिसमें लगातार अपराध या कानून का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति कार्रवाई से बच जाएगा। अदालत के अनुसार, इससे शिकायतकर्ता इस डर से कानूनी कार्रवाई नहीं करेंगे कि संबंधित व्यक्ति ने बाद में आत्महत्या कर ली तो उन्हीं पर मामला दर्ज हो जाएगा।
जस्टिस जोशी ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि जो व्यक्ति किसी दूसरे के कथित अवैध या अनियमित कार्यों के खिलाफ कानून का सहारा लेता है, उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना उचित भी है या नहीं।
अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण तथ्य माना कि जिस दिन पाटिल ने आत्महत्या की, उसी दिन सुबह गायके ने अपने साथ हुई एक घटना को लेकर पुलिस में शिकायत दी थी। हालांकि, पाटिल ने बाद में आत्महत्या कर ली और रात में उस शिकायत को FIR में बदलते हुए पाटिल को भी आरोपी बनाया गया। अदालत ने कहा कि यह शिकायत पाटिल की आत्महत्या के बाद FIR में बदली गई।
पीठ ने कहा कि गायके द्वारा पाटिल के खिलाफ पहले की गई अन्य कथित दुर्भावनापूर्ण कार्यवाहियां कम से कम 20 साल पुरानी थीं और अंततः उनमें पाटिल बरी हो गए।
अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि पाटिल को उस दिन गायके द्वारा पुलिस में की गई शिकायत की जानकारी थी। इसलिए उस शिकायत को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा कि अपने साथ हुई घटना की शिकायत पुलिस में करना याचिकाकर्ता का संवैधानिक अधिकार था। घटना के होने का रिकॉर्ड भी मौजूद था, इसलिए इस संबंध में उसके खिलाफ दुर्भावना नहीं मानी जा सकती। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत न्याय पाने का अधिकार पीड़ित का अविच्छेद्य अधिकार है और पुलिस थाने जाकर शिकायत दर्ज कराना किसी भी तरह से आत्महत्या से जोड़कर अपराध नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस जोशी ने कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण और उसका उद्देश्य प्रथम दृष्टया अपने अधिकारों और उस बैंक के हितों की रक्षा करना था, जिसका वह सदस्य था। इसके लिए उसने कानून में उपलब्ध उचित प्रक्रिया का सहारा लिया।
अदालत ने कहा कि आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से किसी सकारात्मक कार्रवाई के अभाव में याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मंशा नहीं मानी जा सकती। ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं है जिससे यह साबित हो कि उसने पाटिल को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का इरादा रखा था या उसका आचरण ऐसा था, जिससे किसी व्यक्ति को अपनी जान देने के लिए प्रेरित होना स्वाभाविक हो।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने सदाशिव गायके के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की।
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