लखनऊ हाई कोर्ट ने चार वकीलों पर लगाया प्रदेश की दोनों अदालतों में 10 साल तक प्रवेश पर रोक
लखनऊ हाई कोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने और मारपीट के आरोप में चार वकीलों पर प्रदेश की दोनों अदालतों में अगली सुनवाई तक प्रवेश पर रोक लगाने का आदेश दिया है। उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ की एक विशेष पीठ ने मारपीट और न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने के मामले में चार अधिवक्ताओं के प्रवेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।

सौजन्य से:- Jagran
लखनऊ कोर्ट में चार वकीलों के प्रवेश पर रोक, हाई कोर्ट ने कहा- 'काली भेड़ों' पर कार्रवाई जरूरी
लखनऊ हाई कोर्ट ने जिला न्यायालय परिसर में मारपीट और न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने के मामले में चार वकीलों के प्रवेश पर रोक लगा दी है। ...और पढ़ें
समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, लखनऊ। लखनऊ जिला न्यायालय परिसर में एक वादकारी और दिल्ली से आए अधिवक्ताओं के साथ मारपीट तथा न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अभूतपूर्व सख्ती दिखाई है।
मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर गठित विशेष पीठ ने चार अधिवक्ताओं सौरभ कुमार वर्मा, हर्षित पांडेय, यश पांडेय और अभय प्रताप वर्मा के लखनऊ जिला न्यायालय परिसर में प्रवेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
साथ ही सभी से पिछले 10 वर्षों के आयकर रिटर्न, अपनी और परिवार की चल-अचल संपत्तियों, व्यवसाय तथा पिछले पांच वर्षों में संपत्ति की खरीद-बिक्री का पूरा विवरण शपथपत्र के साथ प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी।न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने कहा कि न्याय वितरण प्रणाली को किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि अधिकांश अधिवक्ता ईमानदारी और गरिमा के साथ अपने दायित्व निभाते हैं, लेकिन अधिवक्ताओं के वेश में मौजूद कुछ ‘काली भेड़ों’ की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करना समय की मांग है।
न्यायपालिका को मुट्ठीभर लोगों का बंधक नहीं बनने दिया जा सकता। दरअसल, दिल्ली की अधिवक्ता अभिप्सा मोहंती, कोमल अग्रवाल और आशुतोष श्रीवास्तव अपने मुवक्किल आजमगढ़ निवासी वादकारी मोहम्मद शाकिर की तरफ से एक दीवानी (संपत्ति) मुकदमे में वकालतनामा दाखिल करने 21 जुलाई को लखनऊ जिला अदालत पहुंचे थे।
आरोप है कि वहां स्थानीय विपक्षी वकीलों ने उन्हें अदालत में पेश होने से रोका और धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और मारपीट की। अभिप्सा मोहंती ने इस घटना के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ के समक्ष इस मामले को उठाया था।
इस शिकायत पर तत्काल संज्ञान लेते हुए उन्होंने लखनऊ खंडपीठ के प्रशासनिक न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजन राय से स्वयं इस विषय में बात की। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर गठित विशेष पीठ ने उसी दिन शाम सात बजे विशेष सुनवाई की और फिर अगले दिन 22 जुलाई को सुनवाई कर फैसला सुरक्षित कर लिया।पीठ ने जिला जज की रिपोर्ट और न्यायालय परिसर के सीसीटीवी फुटेज का अवलोकन करने के बाद प्रथमदृष्टया पाया कि चारों अधिवक्ता वादकारी मोहम्मद शाकिर के साथ मारपीट करते दिखाई दे रहे हैं।
खबरें और भी
अदालत ने जिला जज और पुलिस को घटना में शामिल अन्य अधिवक्ताओं की भी पहचान कर विवरण अगली सुनवाई तक उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान उपस्थित मोहम्मद शाकिर ने बताया कि मुकदमे की पैरवी करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी गई और उसके साथ बेरहमी से मारपीट की गई। घटना का विवरण देते समय वह भावुक होकर रो पड़ा।
अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि पीड़ित भयभीत और मानसिक रूप से आहत दिखाई दिया। हाईकोर्ट ने स्थानीय इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) के संयुक्त निदेशक स्तर के अधिकारी को संबंधित अधिवक्ताओं की गतिविधियों और पृष्ठभूमि की गोपनीय जांच कर सीलबंद रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही जिला जज और पुलिस को 10 से 20 अज्ञात महिला व पुरुष अधिवक्ताओं की पहचान कर उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने को कहा है।
यदि किसी अधिवक्ता ने किसी संपत्ति विवाद में पेशेवर रूप से पैरवी करने के बाद वही संपत्ति स्वयं खरीद ली है तो यह बार काउंसिल आफ इंडिया की नियमावली के नियम 22-ए के उल्लंघन का मामला हो सकता है। इस संबंध में संबंधित अधिवक्ता से भी जवाब मांगा गया है।
दोनों दीवानी मुकदमों के मूल अभिलेख सीलबंद कर हाई कोर्ट भेजने का आदेश भी दिया गया है।सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि अधिवक्ता सौरभ कुमार वर्मा के खिलाफ लखनऊ के विभिन्न थानों में आठ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इस पर अदालत ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इतने मुकदमे दर्ज होने के बावजूद किसी व्यक्ति का बार एसोसिएशन का पदाधिकारी होना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि दोष सिद्ध होने से पहले कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की जा रही है। पीठ ने डीजीपी और पुलिस आयुक्त, लखनऊ को संबंधित अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज सभी एफआइआर और मुकदमों की वर्तमान स्थिति शपथपत्र के साथ पेश करने का निर्देश दिया है।
इसके अलावा बार काउंसिल आफ इंडिया, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल, केंद्रीय बार एसोसिएशन, गृह एवं विधि मंत्रालय, पुलिस आयुक्त, डीजीपी और आयकर विभाग को भी मामले में पक्षकार बनाया गया है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच में न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने, भूमि कब्जाने या पक्षकारों व अधिवक्ताओं को धमकाने जैसे आरोप सही पाए जाते हैं तो पुलिस भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 के तहत संगठित अपराध का मामला दर्ज करने पर भी विचार करे। साथ ही वादकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया।
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में बड़े मामलों की सुनवाई

राममंदिर चढ़ावा चोरी मामले में सुप्रीम कोर्ट में 10 अगस्त को सुनवाई

भाजपा हमलावर, अदालत ने बोला झूठे थे उत्पीड़न के आरोप बृजभूषण शरण सिंह केस पर

लाइव लॉ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण आदेश और निर्णय - 3 अगस्त - 9 अगस्त, 2026

न्यायालय की संवेदनशीलता पुस्तिका

दिल्ली केस में भाग जाने वाली पत्नी और ससुर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज

पटना हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत के बाद दिया व्यक्ति के लापता होने के मामले में सीबीआई जांच का आदेश

निरीक्षण, मूल्यांकन और शिकायतें: केंद्र ने ट्रिब्यूनलों के लिए नए आयोग का प्रस्ताव रखा
ताज़ा ख़बरें
- ममता बनर्जी पर हमला: अरविंद केजरीवाल का भाजपा पर तीखा हमला
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय साप्ताहिक राउंड-अप: 3 अगस्त - 9 अगस्त, 2026
- यूपी में खराब कानून व्यवस्था पर अखिलेश यादव ने की सरकार की आलोचना
- भाजपा सरकार ने कानून-व्यवस्था को बर्बाद कर दिया: अखिलेश यादव
- स्मृति सभा में शामिल होने पर टिस के दो छात्रों की गिरफ्तारी, अदालत ने जमानत देने से किया इनकार
- मंत्री पटेल ने विपक्ष के आरोपों का दी reply, कहा नहीं ओबीसी आरक्षण घटाया
- क्या भारत में किसी राज्य में धर्म परिवर्तन के लिए सबसे सख्त कानून है?
- ट्रिब्यूनल ने यूपी कार दुर्घटना में मारे गए दंपति के बच्चों को 44 लाख का मुआवजा दिलाया

