सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला, 'मृत्यु तक जेल' संविधान में वैध है
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि आजीवन कारावास की सजा पाने वाले लोगों को बिना छूट के प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रहने की सजा संविधान में वैध है। हालांकि, यह फैसला उन दिनों पर प्रभावी नहीं होगा जब दोषी को सजा में छूट देने वाले प्रावधानों का लाभ नहीं मिल सकता है।

सौजन्य से:- ABP News
नहीं, संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास मौजूद दया या सजा माफी की शक्ति पर इसका कोई असर नहीं होगा.
‘मृत्यु तक जेल में रहने की सजा संवैधानिक रूप से गलत नहीं...’, SC का बड़ी टिप्पणी
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तय कर चुकी है कि SC और HC फांसी की सजा के विकल्प के तौर पर विशेष श्रेणी की सजा दे सकते हैं और फैसले को कई बार चुनौती देना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है.
- हालांकि, राष्ट्रपति-राज्यपाल की दया याचिका शक्ति अप्रभावित रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि किसी दोषी को उसकी मौत होने तक जेल में रखने की सजा संवैधानिक रूप से वैध है. ऐसा आदेश देते समय अदालत का यह कहना भी सही है कि दोषी को सजा में छूट देने वाले प्रावधानों का लाभ नहीं मिल सकेगा. सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा पाने वाले 6 लोगों की याचिका को ठुकराते हुए यह फैसला दिया है.
किन दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी याचिका?
जिन 6 दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, उनमें चंबल का कुख्यात डकैत राम आसरे उर्फ फक्कड़, दिल्ली का साइकोपैथ सीरियल किलर चंद्रकांत झा, अपनी सौतेली मां और सौतेले भाई-बहन का हत्यारा दिल्ली का अतबीर सिंह और एक ही परिवार के 17 लोगों की हत्या करने वाले पंजाब के अमृतसर के तीन भाई सरबजीत सिंह, गुरदेव सिंह और सतनाम सिंह शामिल हैं. इन सबको अंतिम सांस तक सलाखों के पीछे रहने की सजा मिली है.
याचिकाकर्ताओं की दलील पर सुप्रीम कोर्ट का टिप्पणी
याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि IPC की धारा 302 के तहत केवल मौत की सजा या आजीवन कारावास का प्रावधान है. इसमें बिना छूट के प्राकृतिक जीवन के अंत तक कैद की सजा की कोई बात नहीं कही गई है. आजीवन कारावास की सजा पाने वाले लोग 14 साल के बाद रिहाई का आवेदन दे सकते हैं. इससे उन्हें नहीं रोका जाना चाहिए.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया. जजों ने कहा कि प्राकृतिक मृत्यु तक कैद की सजा एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है. 2016 के 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी. श्रीहरन' मामले में 5 जजों की संविधान पीठ यह तय कर चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट फांसी की सजा के विकल्प के तौर पर ऐसी विशेष श्रेणी की सजा दे सकते हैं. इस फैसले को बार-बार चुनौती देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है.
कोर्ट ने मामले में दी स्पष्ट जानकारी
कोर्ट ने साफ किया है कि अगर फैसले में बिना छूट के आजीवन कारावास लिखा है, तो इसका अर्थ मृत्यु तक जेल ही होगा. ऐसे मामलों में सरकार CrPC की धारा 432 (अब BNSS की धारा 473) के तहत सजा माफ या कम नहीं कर सकती है. हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास मौजूद दया या सजा माफी की शक्ति पर इसका असर नहीं होगा.
यह भी पढे़ंः भोजशाला विवाद में SC ने मुस्लिम पक्ष को दिलवाई जगह, नमाज की अनुमति दी
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में बड़े मामलों की सुनवाई

राममंदिर चढ़ावा चोरी मामले में सुप्रीम कोर्ट में 10 अगस्त को सुनवाई

भाजपा हमलावर, अदालत ने बोला झूठे थे उत्पीड़न के आरोप बृजभूषण शरण सिंह केस पर

लाइव लॉ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण आदेश और निर्णय - 3 अगस्त - 9 अगस्त, 2026

न्यायालय की संवेदनशीलता पुस्तिका

दिल्ली केस में भाग जाने वाली पत्नी और ससुर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज

पटना हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत के बाद दिया व्यक्ति के लापता होने के मामले में सीबीआई जांच का आदेश

निरीक्षण, मूल्यांकन और शिकायतें: केंद्र ने ट्रिब्यूनलों के लिए नए आयोग का प्रस्ताव रखा
ताज़ा ख़बरें
- ममता बनर्जी पर हमला: अरविंद केजरीवाल का भाजपा पर तीखा हमला
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय साप्ताहिक राउंड-अप: 3 अगस्त - 9 अगस्त, 2026
- यूपी में खराब कानून व्यवस्था पर अखिलेश यादव ने की सरकार की आलोचना
- भाजपा सरकार ने कानून-व्यवस्था को बर्बाद कर दिया: अखिलेश यादव
- स्मृति सभा में शामिल होने पर टिस के दो छात्रों की गिरफ्तारी, अदालत ने जमानत देने से किया इनकार
- मंत्री पटेल ने विपक्ष के आरोपों का दी reply, कहा नहीं ओबीसी आरक्षण घटाया
- क्या भारत में किसी राज्य में धर्म परिवर्तन के लिए सबसे सख्त कानून है?
- ट्रिब्यूनल ने यूपी कार दुर्घटना में मारे गए दंपति के बच्चों को 44 लाख का मुआवजा दिलाया

