सुप्रीम कोर्ट ने साझा की जजों पर काम की समस्या, जल्दी सुनवाई से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीशों पर उनके काम के बोझ को ध्यान में रखे बगैर मामले पर सुनवाई की समय सीमा तय नहीं करनी चाहिए। सीजेआई ने कहा कि हाई कोर्ट का एक जज सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार जल्दी सुनवाई करने के लिए मजबूर हुआ जिसमें उसे 7.10 बजे तक बैठना पड़ा।

सौजन्य से:- Jagran
जजों पर काम के बोझ को जाने बगैर त्वरित सुनवाई का नहीं दिया जा सकता है निर्देश: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को एक मामले की त्वरित सुनवाई का निर्देश देने से इनकार कर दिया। ...और पढ़ें
समय कम है?
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट को एक मामले की जल्दी सुनवाई का निर्देश देने की मांग पर विचार करने से इन्कार करते हुए कहा कि वह हाईकोर्ट के न्यायाधीशों पर उनके काम के बोझ को ध्यान में रखे बगैर मामले पर सुनवाई की समय सीमा तय करके उन पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाल सकते।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय समय सीमा के भीतर एक मामले की सुनवाई करने के लिए नियमित मामलों की सुनवाई खत्म होने के बाद रात 7.10 बजे तक बैठना पड़ा। आखिरकार उन्होंने आदेश पारित करने को यह कहते हुए टाल दिया कि वह भूखे, थके हुए और फैसला लिखवाने के लिए शारीरिक रूप से असमर्थ थे।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जैसा कि एक जज ने लिखा था, शायद सही ही लिखा था कि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का फैसला करने का निर्देश दिया था,अब शाम के 6.50 या 7.10 बज रहे हैं, उन्होंने समय का जिक्र किया। लिखा मैने अपना लंच भी छोड़ दिया, अब मै पूरी तरह से थका हुआ और निढाल हूं। मैं इस मामले को आगे नहीं ले जा पाउंगा।
सीजेआई ने कहा कि उन्होंने न्यायिक आदेश में इसका जिक्र किया, जिसके लिए वास्तव में हमारी ओर से भी कुछ आत्म मंथन की जरूरत है। उन्होंने यह भी जिक्र किया था कि उनके सामने 200 से ज्यादा नये मामले लंबित थे। सीजेआई ने कहा कि यहां से कोई आदेश पारित करना, भले ही उसमें अनुरोध शब्द का प्रयोग किया गया हो, बहुत मुश्किल हो जाता है।
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इस मामले में सीजेआई सूर्यकांत, जोयमाल्या बाग्ची और विपुल एम.पंचोली की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें 2021 के केस में जल्द फैसले का निर्देश मांगा गया था। सीजेआई ने कहा कि अगर कोर्ट किसी हालिया मामले की सुनवाई तेज करता है तो इसका खामियाजा किसी पुराने केस को भुगतना पड़ेगा।
वह पुराना मामला किसी ऐसे गरीब वादी का हो सकता है जिसके पास सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के लिए पर्याप्त संसाधन न हों। अंत में कोर्ट ने जल्दी सुनवाई की याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया और याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट के समक्ष मांग रखने की छूट दी।
(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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