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सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा सचिव को अवमानना कार्यवाही में नोटिस, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के शिक्षण संस्थानों के नियमन पर माँगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा मंत्रालय के सचिव को चार हफ्ते में जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया, क्योंकि उन्होंने 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पंथनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के पंजीकरण व नियमन पर अदालत के निर्देश का पालन नहीं किया। वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की अवमानना याचिका में सरकार पर समयबद्ध निर्णय न लेने और संविधान के संबंधित अनुच्छेदों की व्याख्या न देने का आरोप लगाया गया है।

15 सितंबर 2026 को 05:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा सचिव को अवमानना कार्यवाही में नोटिस, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के शिक्षण संस्थानों के नियमन पर माँगा जवाब

सौजन्य से:- Jagran

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा सचिव को भेजा नोटिस, शिक्षण संस्थानों के नियमन में लापरवाही पर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा देने वाले संस्थानों के पंजीकरण और नियमन संबंधी ...और पढ़ें

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के सचिव के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही में नोटिस जारी किया।

यह नोटिस 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पंथनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के पंजीकरण, मान्यता, नियमन और निगरानी की मांग करने वाली अर्जी पर फैसला लेने के निर्देश का कथित तौर पर पालन नहीं करने के लिए जारी किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा सचिव को भेजा नोटिस

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की अवमानना याचिका पर आइएएस अधिकारी टीके अनिल कुमार से चार हफ्ते में जवाब तलब किया है। याचिका में आरोप है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का तय समय में पालन करने में विफल रही।

सुप्रीम कोर्ट की यह कार्यवाही उसके 11 मई के आदेश से जुड़ी है, जिसमें उसने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के सामने 10 फरवरी, 2026 को दी गई उपाध्याय की अर्जी पर गौर करने के बाद उनकी रिट याचिका का निपटारा कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने उस समय रिट याचिका पर सुनवाई करने से इन्कार करते हुए केंद्र को तय समय में अर्जी पर फैसला लेने का निर्देश दिया था और याचिकाकर्ता को अर्जी पर फैसले का इंतजार करने को कहा था।

अवमानना याचिका में उपाध्याय ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद संबंधित अधिकारी ने उनकी अर्जी पर कोई फैसला नहीं लिया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 30(1) के दायरे के बारे में भी स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें यह बात शामिल है कि यह अनुच्छेद 19(1)(जी) को ही खास तौर पर दोहराता है और धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थान अनुच्छेद-26 के तहत आते हैं।

अपनी अवमानना याचिका में उपाध्याय ने दावा किया कि उन्होंने जनवरी में उत्तर प्रदेश के कई सीमावर्ती जिलों का दौरा किया और वहां कई ऐसे संस्थान पाए जिनका न तो पंजीकरण हुआ था और न ही उन्हें मान्यता मिली थी। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के सीमावर्ती जिलों में ऐसे बिना पंजीकरण और बिना मान्यता वाले संस्थानों की "भारी संख्या में बढ़ोतरी" हुई है।

(समाचार एजेंसी आइएएनएस के इनपुट के साथ)

यह भी पढ़ें- 'ड्रामा करने में माहिर, कोर्ट में भी कर रहे एक्टिंग', SC ने एक्टर राजपाल यादव को लगाई फटकार

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