क्यों मर्डर करने से लोग नहीं कतरा रहे? जानिए कारण
कानूनी दंडों के बावजूद मर्डर जैसे अपराधों में वृद्धि देखी जा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं जिन्हें हमें समझने की जरूरत है। इनमें से कुछ प्रमुख कारण हैं - पकड़े न जाने का भ्रम, कानूनी प्रक्रिया में देरी, भावनाओं का आवेग, आभा की खोज, भावनात्मक कमी, और सामाजिक दबाव।

सौजन्य से:- Jagran
कड़े कानूनों के बावजूद क्यों मर्डर करने से नहीं कतरा रहे लोग? सबकुछ जानकर भी बेखौफ दे रहे अपराध को अंजाम
कड़े कानूनों के बावजूद लोग हत्या जैसे अपराधों को बेखौफ अंजाम दे रहे हैं। ऐसे क्या कारण हैं जो लोगों ऐसे खौफनाक कदम बिना किसी डर के उठा रहे हैं। ...और पढ़ें
समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आपने केतन अग्रवाल मर्डर केस के बारे में सुना होगा, उससे पहले महालक्ष्मी, राजा रघुवंशी मर्डर केस सामने आया था और भी ऐसी तमाम वारदातें अक्सर सुनने में आती रहती हैं। ऐसे मामले सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या लोगों के मन से कानून व्यवस्था का डर खत्म हो रहा है?
भारत में मर्डर जैसे अपराधों को लेकर काफी कड़े कानून हैं और लोग इस बारे में जानते भी हैं, लेकिन फिर भी ऐसे अपराधों को बेझिझक अंजाम दे रहे हैं। हैरान करने वाली बात यह भी है कि इन लोगों का कोई पुराना क्रिमिनल बैकग्राउंड नहीं रहा है। फिर भी वे बेझिझक मर्डर कर रहे हैं।
इससे सवाल उठना लाजमी है कि सबकुछ जानते-बूझते भी लोग मर्डर करने जैसा कदम क्यों उठा रहे हैं? क्या उन्हें लगता है वो पकड़े नहीं जाएंगे, सजा नहीं मिलेगा या इसके पीछे कुछ और कारण हैं? इन्हीं सवालों का जबाव जानने के लिए हमने सीनियर साइकोलॉजिस्ट डॉ. मोनिका शर्मा से बात की। आइए जानें इस बारे में उनका क्या कहना है।
पकड़े न जाने का भ्रम
ज्यादातर अपराधियों को ये गलतफहमी होती है कि वे इतने शातिर हैं कि पकड़े नहीं जाएंगे। उन्हें लगता है कि उनका प्लान फूल-प्रूफ है। सिया-केतन मामले में भी ऐसा ही था। अपराधी मर्डर को एक्सीडेंट या सुसाइड का रूप देने की कोशिश करते हैं और उन्हें लगता है कि अपनी चतुराई के दम पर वो पुलिस के चंगुल से बच निकलेंगे। कई लोग ये भी मानते हैं कि उनके पास पैसा है, तो वो आसानी से किसी भी अपराध को करके बच सकते हैं। कानून व्यवस्था में भ्रष्टाचारी अफ्सरों की वजह से पुलिस प्रशासन की ये छवि बनी है।
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इंसाफ में देरी से कम होता डर
भारत में कानूनी मुकदमे सालों तक चलते हैं, कोर्ट से मिलती तारीख पर तारीख अपराधियों के मन में हौसला जगाती है कि उन्हें सजा नहीं मिलेगी और ये मामला यूं ही खिंचता रहेगा। इंसाफ में देरी लोगों का कानून पर विश्वास कम करता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
भावनाओं का आवेग
कई बार लोग मर्डर करने जैसे कदम गुस्सा, जलन, बदला या अंधा प्यार जैसी भावनाओं के आवेग में आकर उठाते हैं। ऐसे में क्राइम ऑफ पैशन के वक्त इंसान सजा या कानून के बारे में सोच नहीं पाता और भावनाओं में बहकर गलत कदम उठा लेता है।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनमें एंपैथी की भारी कमी होती है। इंटरनेट और मीडिया पर लगातार हिंसक कंटेंट देखने से भी लोग हिंसा के लिए डिसेंसिटाइज ह रहे हैं। उन्हें खून-खराबा अब बहुत आम बात लगने लगी है। इसलिए भी लोग ऐसे फैसले ले लेते हैं और उनके पास इसका जस्टिफिकेशन भी होता है, जो उन्हें बिल्कुल सही लगता है। कई बार नशे या मेंटल स्ट्रेस में भी लोग सही-गलत का फर्क भूलकर अपराध कर बैठते हैं।
झूठी शान और सामाजिक दबाव
भारतीय समाज में शादी, लोग क्या सोचेंगे, परिवार की इज्जत और समाज के खोखले नियमों का काफी दबाव बोता है। केतन मर्डर केस में समाज में बदनामी से बचने की कोशिश ने एक खौफनाक साजिश का रूप ले लिया। ऐसे कई मामले अक्सर देखने को मिलते हैं, जिसमें परिवार की इज्जत बचाने के लिए लोग किसी का खून तक करने में नहीं झिझकते।
केवल कानून काफी नहीं
सख्त कानून होने के बावजूद भी लोग अपराध करने से नहीं झिझक रहे, तो इसका मतलब साफ है कि इन्हें रोकने के लिए सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है। समाज में ऐसे अपराधों को कम करने के लिए कानूनों के बारे में लोगों को जागरूक करना होगा, इंसाफ की रफ्तार तेज करनी होगी, ताकि अपराधियों के मन में कानून का खौफ बैठे। साथ ही, बचपन से ही नैतिक मूल्य समझाने होंगे और समाज में लोगों की मेंटल हेल्थ के बारे में भी जागरूकता बढ़ानी होगी।
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