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जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी की 16 साल की लड़ाई: गवाह नहीं मुकरने दिए, पुलिस वालों को सजा दिलाई

जसवंत सिंग खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने 16 साल तक पति के इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ी। उन्होंने गवाहों को मुकरने नहीं दिया और पुलिस वालों को सजा दिलाने में सफलता पाई। उनकी इस लड़ाई की कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है।

7 जुलाई 2026 को 12:58 am बजे
जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी की 16 साल की लड़ाई: गवाह नहीं मुकरने दिए, पुलिस वालों को सजा दिलाई

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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पंजाब- जसवंत खालड़ा की पत्नी 16 साल तक लड़ीं:गवाह मुकरने नहीं दिए; इन्हीं के पति पर बनी OTT से हटी दिलजीत की फिल्म 'सतलुज'

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पंजाबी एक्टर दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज (पंजाब 95) रिलीज के 2 ही दिन बाद OTT प्लेटफॉर्म से हटने के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा फिर चर्चा में हैं। जसवंत खालड़ा ने श्मशान घाट, नगर निगम समेत अन्य जगहों से रिकॉर्ड इकट्ठा कर दावा किया था

जसवंत खालड़ा को घर के बाहर से किडनैप कर उनकी हत्या कर दी गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने 16 साल की लंबी लड़ाई लड़ी। जिसके बाद दोषी पुलिस वालों को सजा हुई। वह पति के इंसाफ के लिए ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ीं।

हालांकि उन्हें आज भी इस बात का मलाल है कि उन्होंने दोषियों को तो सजा दिला दी लेकिन उनके पति के साथ क्या हुआ, आज तक पता नहीं चला। घर से किडनैपिंग के बाद उनका कत्ल कैसे किया गया, किसी ने इसके बारे में राज नहीं उगला। पति को इंसाफ दिलाने के लिए बीबी खालड़ा ने क्या किया, गवाह न मुकरें, इसके लिए क्या कोशिश की, आखिर कैसे CBI जांच शुरू हुई, ये सब जानने के लिए पढ़िए पूरी रिपोर्ट….

पति को इंसाफ के लिए परमजीत कौर खालड़ा का संघर्ष जानिए:-

- 6 सितंबर 1995 की सुबह घर से बाहर से उठाया: 6 सितंबर 1995 की सुबह जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर स्थित अपने घर के बाहर कार धो रहे थे। तभी पंजाब पुलिस के मुलाजिम उठा ले गए। घटना के तुरंत बाद परमजीत कौर खालड़ा ने आसपास के लोगों से जानकारी जुटाई और उन पुलिस अधिकारियों की पहचान की। उसी दिन उन्होंने सीनियर पुलिस अधिकारियों और पंजाब सरकार को टेलीग्राम भेजकर पति को पुलिस ने हिरासत में लेने की बात बताई और उन्हें तुरंत अदालत के सामने पेश करने की मांग की।

- 7 सितंबर 1995 को अपहरण की FIR दर्ज करवाई: 7 सितंबर 1995 को बीबी खालड़ा ने पति को ढूंढने की लड़ाई शुरू कर दी। उन्होंने अमृतसर के थाना इस्लामाबाद में अपहरण की FIR नंबर 72/1995 दर्ज कराई। बीबी खालड़ा के अनुसार पुलिस लगातार यह कहती रही कि जसवंत सिंह खालड़ा उसकी हिरासत में नहीं हैं, मगर उन्होंने पुलिस के इस दावे को नहीं माना और चश्मदीदों की जानकारी जुटाकर सबूत जुटाए।

- गवाह इकट्ठा किए और कोर्ट जाने के लिए मनाया: शुरुआती दिनों में बीबी खालड़ा ने पुलिस की जांच के भरोसे रहने के बजाय उन लोगों से संपर्क किया, जिन्होंने अपहरण होते देखा। उन्होंने पड़ोसियों, जानकारों और जसवंत सिंह खालड़ा के साथियों के बयान करवाए। बाद में उनको गवाही के लिए मनाया और कोर्ट का रुख किया।

- पुलिस पर भरोसा टूटा, सुप्रीम कोर्ट पहुंची: 7 सितंबर से 11 सितंबर तक 4 दिन पुलिस से कोई जवाब न मिलने पर बीबी खालड़ा का पुलिस पर से भरोसा टूट गया। इसके बाद परमजीत कौर खालड़ा ने 12 सितंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगा दी। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर मांग की कि पंजाब सरकार बताए कि उनके पति कहां हैं। उन्होंने अदालत से कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा को पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में लिया है और उन्हें कोर्ट के सामने पेश किया जाए।

- सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर सरकार से मांगा जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और पंजाब सरकार, DGP तथा अमृतसर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगा। पुलिस लगातार यह कहती रही कि उसके पास जसवंत सिंह खालड़ा नहीं हैं। इसके जवाब में परमजीत कौर ने अदालत के सामने प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और दस्तावेज रखे, जिससे पुलिस के दावों पर सवाल खड़े होने लगे।

- पुलिस के जवाब से नाखुश कोर्ट ने CBI को दी जांच: सुनवाई के दौरान यह साफ होने लगा कि पंजाब पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं है। परमजीत कौर ने अदालत में स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराने की मांग की। उनकी दलीलों और सबूतों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 15 नवंबर 1995 को पूरे मामले की जांच CBI को सौंप दी। यह उनकी कानूनी लड़ाई की पहली बड़ी सफलता थी।

- गवाहों से लगातार मिलती रहीं ताकि मुकर न जाएं: CBI जांच शुरू होने के बाद भी परमजीत कौर खालड़ा का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उन्होंने अपने पति द्वारा इकट्ठे किए गए दस्तावेज CBI को दिए। संभावित गवाहों की जानकारी दी, उनसे संपर्क बनाए रखा और जांच अधिकारियों के साथ लगातार सहयोग किया। उन्होंने यह भी प्रयास किया कि गवाह किसी दबाव में अपने बयान न बदलें और मुकदमा कमजोर न पड़े, इसके लिए वह उनसे मिलती रहीं।

- 10 साल बाद मिली पहली बड़ी सफलता: करीब 10 साल बाद 18 नवंबर 2005 को CBI अदालत ने फैसला सुनाया। अदालत ने 6 पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया। इनमें DSP जसपाल सिंह और ASI अमरजीत सिंह को उम्रकैद हुई। इसके अलावा SI सतनाम सिंह, SI सुरिंदर पाल सिंह, SI जसबीर सिंह और हेड कॉन्स्टेबल पृथीपाल सिंह को 7-7 साल की कैद हुई। इस फैसले से परमजीत कौर खालसा को पति को इंसाफ दिलाने के लिए लड़ी गई जंग में पहली बड़ी सफलता मिली।

- दोषी अधिकारियों ने फैसले को चुनौती दी: दोषी अधिकारियों ने CBI के फैसले को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील की सुनवाई के दौरान भी परमजीत कौर ने मुकदमे का सामना किया। अक्टूबर 2007 में हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि जसवंत सिंह खालड़ा का अपहरण और हत्या साबित होती है और इसके लिए संबंधित पुलिस अधिकारी जिम्मेदार हैं। साल 2007 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चार अन्य दोषियों की सजा भी बढ़ाकर उम्रकैद कर दी। वहीं SI अमरजीत सिंह को बरी कर दिया।

- दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया फैसला: हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दोषी अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। इससे एक बार फिर परमजीत कौर को लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। उन्होंने मुकदमे को अंतिम मुकाम तक पहुंचाने का फैसला किया और सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ी। 23 नवंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इस निर्णय के साथ लगभग 16 साल तक चली परमजीत कौर खालड़ा की कानूनी लड़ाई को निर्णायक सफलता मिली। यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में गिना जाता है।

- बड़े बादल से मिलीं तो कहा कि इसे भूल जाओ: परमजीत कौर खालड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया कि पति को इंसाफ दिलाने के लिए वह पंजाब की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी अकाली दल के साथ भी चलीं। उन्होंने बताया कि जब प्रकाश सिंह बादल सीएम थे, तो उनसे मिलीं लेकिन जवाब मिला कि इस केस को भूल जाओ। परमजीत कौर खालड़ा ने बताया कि उनके पति अकाली दल के साथ जुड़े थे, उम्मीद थी कि वहां से इंसाफ मिलेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

- कई लावारिस लोगों का पता लगाने के लिए लड़ाई अभी भी जारी: खालड़ा ने बताया कि पति को इंसाफ की लड़ाई तो पूरी हो गई लेकिन पति ने लावारिस लोगों को ढूंढने की जो लड़ाई शुरू की थी वो आज भी जारी है। अभी बीबी परमजीत कौर खालड़ा इस लड़ाई को आगे बढ़ा रही हैं। बीबी खालड़ा ने कहा कि ये अकेले कोर्ट की लड़ाई नहीं थी, ये लड़ाई उन सब लोगों की है जिनके बच्चे गायब हो गए और उनकी लाशों को चोरी छिपे जला दिया गया।

*************** ये खबर भी पढ़ें…

दिलजीत की 2 दिन पहले रिलीज 'सतलुज' OTT से हटाई:फिल्म में दावा- पंजाब में फर्जी मुठभेड़ में 25 हजार मारे; दोसांझ ने पायरेसी की अपील की

पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म को अचानक OTT प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। खालड़ा ने आतंकवाद के दौर में पंजाब में फेक एनकाउंटर में 25 हजार युवाओं को मारने का दावा किया था। यह फिल्म 3 साल की रोक के बाद 2 दिन पहले ही नाम बदलकर रिलीज की गई थी। पहले इसका नाम 'पंजाब 95' था, जिसे 'सतलुज' नाम से OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया था (पढ़ें पूरी खबर)

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