सुप्रीम कोर्ट ने 2014 से जेल में बंद दो आतंकवादियों को जमानत दी, कहा- इतने लंबे समय कैद रखना गलत
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 से जेल में बंद दो संदिग्ध आतंकवादियों को जमानत दे दिया है। अदालत ने कहा कि उन्हें इतने लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले आजादी के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
2014 से जेल में बंद इंडियन मुजाहिदीन के दो संदिग्धों को जमानत, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'इतने साल कैद रखना गलत'
अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं, को साल 2014 में ही तीन एफआईआर के मामले में गिरफ्तार किया गया था, तब से हिरासत में है.
By Sumit Saxena
Published : July 29, 2026 at 7:03 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इंडियन मुजाहिदीन के दो संदिग्ध आतंकियों को जमानत दे दी. ये दोनों 2014 से जेल में बंद थे. अदालत ने कहा कि उन्हें इतने लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले आजादी के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है.
यह आदेश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 27 जुलाई को पारित किया. पीठ ने ध्यान दिलाया कि दोनों याचिकाकर्ता दिल्ली में दर्ज एक आतंकी मामले के सिलसिले में जेल में बंद थे. अदालत ने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं, मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर को साल 2014 में ही तीन एफआईआर के मामले में गिरफ्तार किया गया था और वे तब से ही हिरासत में हैं.
पीठ ने कहा, "मामले की कार्रवाई से यह भी पता चलता है कि जनवरी 2025 से लेकर अब तक केवल दो गवाहों से ही पूछताछ हो पाई है, जिनमें से भी एक से केवल अधूरी पूछताछ हुई है. मुकदमे की रफ्तार बेहद धीमी रही है और निकट भविष्य में इस मुकदमे के पूरा होने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती."
पीठ ने कहा कि प्रतिवादियों के जवाबी हलफनामे के अनुसार, इस मामले में अब तक 25 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. पीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि सह-आरोपी मोहम्मद मारूफ को पहले ही जमानत पर रिहा किया जा चुका है. अदालत ने नोट किया कि जयपुर में दर्ज 2014 की एफआईआर से जुड़े मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं की सजा पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है, जिसमें उन्हें राजस्थान की एक विशेष अदालत ने दोषी ठहराया था.
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं की किसी अन्य मामले में जरूरत नहीं है, तो उन्हें नई दिल्ली के स्पेशल सेल थाने में 22 नवंबर, 2011 को दर्ज एफआईआर के सिलसिले में निचली अदालत द्वारा तय नियमों और शर्तों पर जमानत पर रिहा कर दिया जाए.
पीठ ने स्पष्ट किया, "यह साफ किया जाता है कि यहां की गई टिप्पणियां केवल जमानत की इन याचिकाओं पर फैसला सुनाने तक ही सीमित हैं, और इन्हें निचली अदालत में लंबित मामले के गुणों या दोषों पर अदालत की राय नहीं माना जाना चाहिए."
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को मुकदमे की सुनवाई में लगातार सहयोग करना होगा. अदालत ने कहा, "यदि निचली अदालत या अभियोजन पक्ष को लगता है कि याचिकाकर्ता मुकदमे को पूरा होने में देरी कर रहे हैं, सुनवाई में सहयोग नहीं कर रहे हैं, या उन्हें मिली आजादी का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, तो अभियोजन पक्ष उचित आदेशों के लिए इस अदालत को इसकी जानकारी देने के लिए स्वतंत्र होगा."
सर्वोच्च अदालत का यह आदेश अंसारी और अजहर द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट के अप्रैल के एक आदेश को चुनौती देने वाली अलग-अलग याचिकाओं पर आया है. हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा नवंबर 2011 में दर्ज मामले में उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था.
यह मामला तब शुरू हुआ था जब नवंबर 2011 में इंडियन मुजाहिदीन के एक कथित सदस्य मोहम्मद कतील सिद्दीकी को पकड़ा गया था. उसने कथित तौर पर दिल्ली और उसके आसपास आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए संगठन के एक 'राजस्थान मॉड्यूल' को तैयार किए जाने का खुलासा किया था. इन खुलासों और मिली जानकारी के आधार पर, स्पेशल सेल ने कई लोगों को गिरफ्तार किया था और भारी मात्रा में विस्फोटक व गोला-बारूद जब्त किया था.
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