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दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, बेघर कैंसर मरीज के लिए 3 लाख मुआवजा

दिल्ली हाई कोर्ट ने बेघर ब्लड कैंसर मरीज विक्रांत तिवारी के इलाज के लिए दिल्ली सरकार को एक सप्ताह के भीतर तीन लाख रुपये की वित्तीय सहायता सीधे एम्स को जारी करने का निरदेश दिया है।

9 जुलाई 2026 को 03:57 pm बजे
दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, बेघर कैंसर मरीज के लिए 3 लाख मुआवजा

सौजन्य से:- Jagran

बेघर कैंसर मरीज की मदद के लिए अदालत का बड़ा फैसला, दिल्ली सरकार को एक हफ्ते में 3 लाख देने के आदेश

दिल्ली हाई कोर्ट ने एम्स में भर्ती एक बेघर ब्लड कैंसर मरीज विक्रांत तिवारी के इलाज के लिए दिल्ली सरकार को एक सप्ताह के भीतर तीन लाख रुपये की वित्तीय स ...और पढ़ें

HighLights

- दिल्ली हाई कोर्ट का बेघर कैंसर मरीज को राहत देने का आदेश।

- दिल्ली सरकार को एम्स को तीन लाख रुपये देने का निर्देश।

- दस्तावेजों की कमी के कारण इलाज में देरी नहीं की जा सकती।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एम्स में ब्लड कैंसर का इलाज करा रहे एक बेघर मरीज को बड़ी राहत देते हुए दिल्ली सरकार को एक सप्ताह के भीतर तीन लाख रुपये की वित्तीय सहायता एम्स को जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मरीज के पास उपलब्ध नहीं होने वाले दस्तावेज की मांग कर सहायता देने में देरी नहीं की जा सकती।

दिल्ली हाई कोर्ट ने बृहस्पतिवार को दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि एम्स में इलाज करा रहे 37 वर्षीय बेघर ब्लड कैंसर मरीज विक्रांत तिवारी के उपचार के लिए एक सप्ताह के भीतर तीन लाख रुपये की वित्तीय सहायता सीधे एम्स को जारी की जाए। अदालत ने एम्स की ओर से इलाज जारी रखने के आश्वासन को रिकाॅर्ड पर लेते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।

अदालत ने कहा कि मरीज बेघर है और सरकारी आश्रय गृह में रह रहा है, इसलिए उससे ऐसे दस्तावेज मांगना उचित नहीं होगा जो उसके पास उपलब्ध ही नहीं हैं। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने यह आदेश विक्रांंत तिवारी की याचिका का निस्तारण करते हुए दिया। सुनवाई के दौरान एम्स की ओर से दलील दी गई कि मरीज फिलहाल ओरल कीमोथेरेपी पर है, उसकी स्थिति स्थिर है और एम्स उसकी आवश्यक चिकित्सा जारी रखेगा।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने दलील दी कि विक्रांत तिवारी के पास इलाज का खर्च उठाने के लिए कोई आर्थिक संसाधन नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों का संवैधानिक दायित्व है कि जीवनरक्षक इलाज के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएं। याचिका में दलील दी गई है कि विक्रांत तिवारी वर्ष 2024 से डिफ्यूज लार्ज बी-सेल लिम्फोमा (ब्लड कैंसर) से पीड़ित हैं।

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इसके अलावा वह टीबी और एचआइवी से भी संक्रमित हैं। बेघर होने के कारण वह सरकारी आश्रय गृह में रहते हैं और स्वास्थ्य ठीक रहने पर ही दिहाड़ी मजदूरी कर पाते हैं। याचिका के अनुसार, एम्स ने इलाज का खर्च लगभग तीन लाख रुपये बताया था।

आर्थिक सहायता के लिए मरीज ने एम्स के मेडिकल समाजिक कार्य अधिकारी, उप मंडलाधिकारी (एसडीएम) सहित अन्य अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन कोई प्रभावी सहायता नहीं मिलने पर उसे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। याचिका में कहा गया था कि आर्थिक सहायता नहीं देना संविधान के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन है।

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रीतिका

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