कानूनी कीमत से लेकर आर्थिक आजादी तक: क्या घरेलू काम की कीमत का फैसला बदलेगा कुछ?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक सीमित संदर्भ में लिया गया था कि दुर्घटना में मृत महिला को किस प्रकार का मुआवजा दिया जाए। लेकिन महिलाओं के श्रम और आर्थिक योगदान को पूरी तरह से समझने के लिए नाकाफी है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट का गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता कहना कितना बड़ा वैचारिक बदलाव है ?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक सीमित संदर्भ में लिया गया था कि दुर्घटना में मृत महिला को किस प्रकार का मुआवजा दिया जाए। अदालत ने माना कि अगर महिला नौकरी नहीं भी करती है, तो उसके द्वारा किए जाने वाले निःशुल्क श्रम का ध्यान रखना आवश्यक है। यह स्वागत योग्य फैसला है, लेकिन महिलाओं के श्रम और आर्थिक योगदान को पूरी तरह से समझने के लिए नाकाफी है।
घरेलू काम को विना पैसे का कर्तव्य माना गया। क्या 30 हजार रुपये की कानूनी कीमत तय होने से पुरुषो की सोच बदलेगी और क्या यह रकम उनके वास्तविक त्याग व श्रम का सही मूल्यांकन है ?
घरेलू काम को कर्तव्य के रूप में पेश करना महज पुरुष प्रधानता से जुड़ी सोच नहीं, यह हर शोषणकारी व्यवस्था में शोषक वर्ग को मजबूत करने और टिकाए रखने के लिए आवश्यक है। महिलाओं के निःशुल्क श्रम को केवल घर और परिवार के भीतर देखना सही नहीं है। घर के बाहर के समाज में उसकी कीमत और योगदान को समझना आवश्यक है। हर शोषण की व्यवस्था का शोषक वर्ग अपने खर्चों को कम करने में जुटा रहता है। इसके लिए वह श्रमिकों के वेतन को कम करने के हर संभव प्रयास करता है। इस तरह के शोषण के शिकार महिला और पुरुष मजदूर, दोनों होते हैं। महिला मजदूरों का शोषण अधिक होता है क्योंकि उन्हें मुंह बंद करके काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। ऐसे में महिलाओं के श्रम की कीमत इस तरह से तय करना तार्किक नहीं है।
क्या यह फैसला देश की GDP में केयर इकॉनमी को शामिल करने का आधार बनेगा ?
ऐसा तब ही होगा जब समाज में इसके लिए आवाज उठेगी। केवल महिलाओं और महिला संगठनों को ही नहीं, तमाम प्रजातांत्रिक संगठनों को ऐसा करना होगा, राजनीतिक दलों को इस लड़ाई में शामिल होना पड़ेगा और सरकारों को इसके लिए नीतियां बनानी होंगी।
फैसला अभी सिर्फ दुर्घटना मुआवजा तक सीमित है। क्या इसे तलाक और संपत्ति के अधिकारों में भी लागू किया जाना चाहिए?
फैसले के तार्किक आधार को पूरी तरह से अपनाया जाना चाहिए
ग्रामीण महिलाएं घर के साथ खेती और पशुपालन भी संभालती है। क्या फैसला उनके वहुआयामी संघर्ष के साथ न्याय करता है?
ग्रामीण महिलाओं को किसान या पशुपालक के रूप में नहीं पहचाना जाता। यह सच है कि खेती के काम का बड़ा हिस्सा महिलाएं संभालती हैं, लेकिन उन्हें किसान होने का लाभ नहीं मिलता। यहां तक कि अगर खेती करने वाली कोई महिला आत्महत्या कर लेती है तो मुआवजा परिवार को नहीं मिलता। खेती करने वाली महिलाओं को 'किसान पहचान पत्र' भी नहीं मिलता है, न ही कर्ज दिया जाता है। पशुपालन और दुग्ध का कारोबार करने वाली महिलाओं को भी कोई सरकारी मान्यता या सहायता नहीं दी जाती। आदिवासी महिलाओं को भी वन विभाग के अत्याचारों का सामना करना पड़ता है।
काल्पनिक आय तो कागजों पर है। महिला के दैनिक जीवन में आत्मसम्मान और वित्तीय आजादी के लिए इसे कैसे लागू किया जाए?
मैंने पहले ही बताया इसके लिए होने वाले आंदोलनों का समर्थन तमाम जनवादी ताकतों और राजनीतिक दलों को करना होगा। सरकार पर महिलाओं के लिए उचित नीतियों के लिए दबाव बनाना होगा।
क्या अब सरकारों को सीधे गृहिणियो के खाते में घरेलू भत्ता देने जैसी वास्तविक नीतियां बनानी चाहिए?
इस तरह के भत्ते देने की बात तो तमाम सरकारें करती हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में महिलाओं को दी जाने वाली नकद सहायता के लिए विधवा और वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं में कटौती की गई है। वहीं, केरल सरकार हर महीने महिलाओं के खातों में पेंशन आदि भेज रही है।
घरेलू काम को आर्थिक गरिमा मिलने से क्या महिलाओं पर परफेक्ट होम मेकर बनने का दबाव और बढ़ जाएगा?
घरेलू काम के बोझ के कारण ही बहुत सी महिलाएं घर के बाहर काम नहीं कर पाती हैं। महिलाओं पर परफेक्ट होम मेकर बनाने का दबाव आज से नहीं, सदियों से है। ताकि वह निःशुल्क सेवाएं या बहुत कम वेतन पर काम करती रहें।
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