49 साल पुराने हत्याकांड में न्याय: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 5 आरोपियों को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को पलटा
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में 1977 में हुई हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराए गए 5 लोगों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच में गड़बड़ियां और एफआईआर में देरी के कारण अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा। यह फैसला ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों के विपरीत है।

सौजन्य से:- Jagran
उत्तर प्रदेश में हुई हत्या के 49 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, दोषी ठहराए गए पांच लोगों को किया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में 1977 के एक हत्या मामले में ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पांच लोगों को बरी क ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने 1977 के हत्या मामले में पांच को बरी किया।
- एफआईआर भेजने में देरी और जांच में गड़बड़ी मुख्य कारण।
- ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसले को पलटा गया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में 1977 में हुई हत्या के एक मामले में ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पांच लोगों को बरी कर दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को एफआइआर की प्रति भेजने में देरी महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर इसे समय से पहले दर्ज करने, पिछली तारीख डालने और रिकॉर्ड में छेड़छाड़ के आरोपों के साथ जोड़ा जाता है, तो संदेह पैदा होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 1977 के मामले में पांच दोषियों को किया बरी
पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस मेहता ने कहा कि जांच में गंभीर गड़बड़ियों, बिना वजह हुई देरी और एफआइआर की प्रामाणिकता पर संदेह की वजह से अभियोजन पक्ष आरोपितों का गुनाह साबित करने में विफल रहा।
सिर्फ मजिस्ट्रेट के पास एफआइआर भेजने में देरी को अभियोजन पक्ष के लिए घातक नहीं माना जा सकता। न ही ऐसी देरी को आरोप खारिज करने का अकेला आधार बनाया जा सकता है।
हालांकि, पहले का समय या तारीख दिखाने और रिकॉर्ड में हेराफेरी के आरोप सिर्फ अटकलें नहीं हैं। रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों से उन्हें ठोस आधार मिलता है। ऐसे तथ्य भी सामने आए हैं, जिनसे जांच की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है।
शीर्ष अदालत ने हीरा लाल, राज बक्स और सूबेदार की अपील स्वीकार कर ली। राज किशोर और देव प्रसाद से जुड़ी अपीलें कार्यवाही के दौरान उनकी मौत के कारण खत्म हो गईं। एक सह-आरोपित राम धनी की इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की प्रक्रिया के दौरान हो गई थी।
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क्या है मामला?
यह मामला 28 जून, 1977 को गोंडा जिले में हरिहर सरन की हत्या से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने 1981 में छह आरोपितों को दोषी ठहराया था और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने 2011 में सजा को बरकरार रखा। इसके बाद दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के एक जैसे फैसलों को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के बयान में काफी कमियां थीं, जिनसे संदेह पैदा होता है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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