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बे-वारंट का उपयोग अवैध हिरासत के लिए नहीं हो सकता, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बंदी को तत्काल रिहा करने का दिया आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि बे-वारंट का उपयोग किसी स्वतंत्र व्यक्ति को गिरफ्तार करने या उसकी अवैध हिरासत जारी रखने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याची की तत्काल रिहाई का आदेश दिया है और कहा कि जेल प्रशासन को हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी जेल में बंदी को रखा जाना अवैध है।

3 जुलाई 2026 को 12:23 am बजे
बे-वारंट का उपयोग अवैध हिरासत के लिए नहीं हो सकता, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बंदी को तत्काल रिहा करने का दिया आदेश

सौजन्य से:- Jagran

प्रयागराज : 'अवैध हिरासत के लिए नहीं कर सकते बी-वारंट का उपयोग', हाई कोर्ट ने बंदी को तत्काल रिहा करने का दिया आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि बी-वारंट का उपयोग किसी स्वतंत्र व्यक्ति को गिरफ्तार करने या उसकी अवैध हिरासत जारी रखने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ...और पढ़ें

HighLights

- बी-वारंट का उपयोग अवैध हिरासत के लिए नहीं हो सकता।

- हाई कोर्ट ने याची की तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

- संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिहाई के आदेश का पालन अनिवार्य।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि बी-वारंट का उपयोग किसी स्वतंत्र व्यक्ति को गिरफ्तार करने या उसकी अवैध हिरासत को जारी रखने के लिए नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने अचल कुमार गुप्ता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए की है। कोर्ट ने मेरठ और गाजियाबाद की जेलों में याची की निरंतर हिरासत को कानूनन अवैध करार देते हुए उसे तत्काल प्रभाव से रिहा करने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि याची को गौतमबुद्ध नगर के एक मामले में पहले ही अंतरिम राहत देते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया गया था, लेकिन जेल से वास्तविक रूप से रिहा होने से पहले ही पुलिस ने मेरठ के एक अन्य मामले में उसके खिलाफ बी-वारंट हासिल कर उसे हिरासत में ही रखा।

कोर्ट ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिहाई के आदेश के बाद किसी मजिस्ट्रेट के औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती। यदि जेल प्रशासन हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद बंदी को रोक कर रखता है तो ऐसी हिरासत पूरी तरह से अवैध और गैरकानूनी मानी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया हवाला

मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय या उसके तुरंत बाद लिखित में गिरफ्तारी के स्पष्ट आधार सौंपना अनिवार्य है। याची के खिलाफ गौतमबुद्ध नगर के थाना बीटा-2 में मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसमें हाई कोर्ट ने गत चार फरवरी को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था।

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जेल प्रशासन ने कानूनी बारीकियों और धाराओं के जुड़ने का बहाना बनाकर उसे समय पर रिहा नहीं किया और इसी बीच मेरठ पुलिस ने एक अन्य मामले में बी-वारंट जारी कराकर उसकी कस्टडी ले ली। इसके बाद जब याची मेरठ जेल में था तो गाजियाबाद पुलिस ने भी एक तीसरे मामले में बी-वारंट जारी करा लिया। हाई कोर्ट ने इस सिलसिलेवार कार्रवाई को पूरी तरह गलत पाया और कहा कि एक बार जब शुरुआती हिरासत ही अवैध हो गई तो अलग-अलग मामलों में लगातार बी-वारंट जारी करके उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पुलिस, कानून द्वारा स्थापित सही प्रक्रिया (बिना वारंट गिरफ्तारी के उचित नियम या सक्षम कोर्ट का वैध अरेस्ट वारंट) का पालन करती है तो वह अन्य मामलों में नियमानुसार कार्रवाई के लिए स्वतंत्र है।

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