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हिरासत में टॉर्चर पर कोर्ट की सख्ती: 'कानून के शासन पर हमला', सीबीआई को फटकार

दिल्ली की एक अदालत ने सीबीआई हिरासत में टॉर्चर के आरोपों को गंभीर मानते हुए सीबीआई को निर्देश दिया है कि आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए. अदालत ने कहा कि कस्टोडियल टॉर्चर कानून के शासन पर सबसे गंभीर हमलों में से एक है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए.

7 जुलाई 2026 को 04:57 pm बजे
हिरासत में टॉर्चर पर कोर्ट की सख्ती: 'कानून के शासन पर हमला', सीबीआई को फटकार

सौजन्य से:- AajTak

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दिल्ली की एक विशेष अदालत ने सीबीआई हिरासत में टॉर्चर के आरोपों को बेहद गंभीर मानते हुए कहा है कि कस्टोडियल टॉर्चर (हिरासत में हिंसा) कानून के शासन पर सबसे गंभीर हमलों में से एक है. अदालत ने सीबीआई को निर्देश दिया कि आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए. अगर जांच में किसी अधिकारी की आपराधिक भूमिका या विभागीय लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार आपराधिक और विभागीय कार्रवाई की जाए.

विशेष न्यायाधीश सुशांत चांगोत्रा तीन करोड़ रुपये के कथित रिश्वत मामले में सह-आरोपी प्रभात कुमार (कपूर) की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. प्रभात कुमार की ओर से उनके वकील प्रतीक सोम ने आरोप लगाया कि 16 जून से 22 जून तक सीबीआई रिमांड के दौरान अधिकारियों ने उनके साथ मारपीट की, जिससे उनके बाएं कान और बाईं जांघ में गंभीर चोटें आईं.

अदालत ने कहा कि 19 जून और 20 जून की मेडिको-लीगल रिपोर्ट (एमएलसी) पहली नजर में यह साबित करती हैं कि प्रभात कुमार को सीबीआई की विशेष हिरासत के दौरान शारीरिक चोटें आईं. मेडिकल रिपोर्ट में बाईं जांघ पर गंभीर चोट तथा बाएं कान में रक्त का थक्का और सूजन (हेमेटोमा) दर्ज की गई है. अदालत ने कहा कि ये महज सामान्य आरोप नहीं हैं, बल्कि सरकारी डॉक्टरों द्वारा तैयार किए गए समकालीन मेडिकल रिकॉर्ड से इनकी पुष्टि होती है.

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कोर्ट ने यह भी कहा कि सीबीआई इन चोटों के कारणों का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सकी है. एजेंसी ने यह दावा भी नहीं किया कि चोटें स्वयं लगी थीं या किसी दुर्घटना का परिणाम थीं. अदालत के अनुसार, आरोपी को हिरासत के दौरान दूसरे पुलिस थाने ले जाना और मेडिकल रिकॉर्ड, दोनों मिलकर हिरासत में हिंसा के आरोपों को मजबूत बनाते हैं.

न्यायाधीश ने कहा कि कोई भी जांच एजेंसी, चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो, पूछताछ के दौरान हिंसा, दबाव या यातना का सहारा नहीं ले सकती. किसी भी आपराधिक जांच की वैधता उसकी निष्पक्षता और कानूनी प्रक्रिया के पालन में होती है, न कि डर या शारीरिक बल के जरिए जानकारी हासिल करने की क्षमता में.

अदालत ने कहा कि पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी जांचकर्ता और दंड देने वाले की दोहरी भूमिका नहीं निभा सकती. किसी अपराध की सजा केवल अदालत ही विधि सम्मत प्रक्रिया अपनाकर दे सकती है. इस मूल सिद्धांत से विचलन कानून के शासन पर सीधा प्रहार है. कोर्ट ने कहा कि जब हिरासत में रहे आरोपी के शरीर पर मेडिकल रिकॉर्ड से चोटों की पुष्टि हो रही हो, तब अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती. यदि ऐसे आरोपों को नजरअंदाज किया गया तो यह संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के प्रति न्यायिक उदासीनता होगी और आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कमजोर होगा.

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अदालत ने सीबीआई निदेशक को आदेश की प्रति भेजते हुए कहा कि मामले की जांच वर्तमान जांच से असंबंधित किसी वरिष्ठ अधिकारी से कराई जाए, ताकि जांच की निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे. साथ ही संबंधित जेल अधीक्षक को प्रभात कुमार का Safdarjung Hospital में चिकित्सकीय परीक्षण कराकर आवश्यक इलाज सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया गया है. अदालत ने सीबीआई से दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है.

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