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आदिवासी अधिकारों की अनदेखी: जस्टिस लोकुर ने वन‑और पंचायत अधिनियमों के गैर-प्रवर्तन को उजागर किया

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम 2006 और पंचायत (अधिसूचित क्षेत्र) अधिनियम के कार्यान्वयन में बड़ी खामियां हैं, जिससे आदिवासी जनजातियों को भूमि, वन और प्राकृतिक संसाधनों पर पर्याप्त अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने ग्राम सभाओं के अधिकारों को लगातार दरकिनार किए जाने और कानूनों के लागू न होने पर न्यायालयों की सुनवाई की मांग की।

6 सितंबर 2026 को 08:31 pm बजे
आदिवासी अधिकारों की अनदेखी: जस्टिस लोकुर ने वन‑और पंचायत अधिनियमों के गैर-प्रवर्तन को उजागर किया

सौजन्य से:- Jagran

'देश में आदिवासियों के अधिकारों की हो रही अनदेखी', सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज लोकुर ने कानूनों के लागू न होने का उठाया मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने कहा कि वन अधिकार और पेसा अधिनियमों के सही से लागू ...और पढ़ें

HighLights

- वन अधिकार और पेसा अधिनियम सही से लागू नहीं।

- आदिवासियों को भूमि, वन अधिकारों से वंचित रखा गया।

- ग्राम सभाओं के अधिकार लगातार दरकिनार किए जा रहे।

पीटीआई, नई दिल्ली। देश में वन अधिकार अधिनियम और पंचायत (अधिसूचित क्षेत्र) अधिनियम को सही तरीके से लागू नहीं किया गया है। इसके चलते आदिवासियों को भूमि, वन और प्राकृतिक संसाधनों पर पर्याप्त अधिकार नहीं मिल पाए। इस सिलसिले में ग्राम सभाओं के अधिकारों को दरकिनार किया गया।

यह बात सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने कही है। आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस लोकुर ने कहा, वन अधिकार अधिनियम 2006 से लागू है। यह कानून जंगल में रहने वाले आदिवासी समुदाय और अन्य लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए बना था। लेकिन 20 वर्ष बीतने के बाद भी इस कानून को उचित तरीके से लागू नहीं किया गया है।

आदिवासियों की सबसे बड़ी समस्या उनके लिए बने कानूनों का लागू न होना है।

जस्टिस लोकुर ने कहा, आशंका यहां तक है कि अगर वन अधिकार अधिनियम पूरी तरह से लागू हुआ तो आदिवासी लोगों के खिलाफ ही हजारों मामले दर्ज हो जाएंगे। कहा, वन भूमि को लेकर तमाम मामले न्यायालयों में लंबित हैं। इसी के चलते आदिवासी के हित वाले कानूनों पर काम नहीं हो पा रहा है। जब तक ये मामले लंबित रहेंगे तब तक आदिवासियों को भूमि संबंधी कोई लाभ मिलना संभव नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने अधिसूचित क्षेत्र के लिए बने पंचायत अधिनियम की विफलता का भी जिक्र किया। कहा, पंचायती राज व्यवस्था के तहत 1996 में बने इस कानून के तहत ग्राम सभाओं को स्थानीय समुदायों संसाधनों का लाभ देने का अधिकार दिया गया था। लेकिन कानून बनने के 30 वर्ष बाद भी यह उचित रूप में लागू नहीं हो पाया है जिसके चलते जंगल में रहने वाले आदिवासी और अन्य समुदाय के लोग इससे जुड़े लाभ से वंचित हैं।

जस्टिस लोकुर ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2013 में ओडिशा खनन निगम के मामले में दिए गए आदेश का जिक्र करते हुए बताया कि यह मामला बाक्साइट की खदान से संबंधित था।

शीर्ष न्यायालय ने इसके बारे में निर्णय लेने में क्षेत्र की ग्राम सभा की भूमिका को स्पष्ट किया और कहा कि आदिवासी समुदाय पर इसके प्रभाव को भी देखा जाना चाहिए। पूर्व न्यायाधीश ने कहा, कोर्ट से जब कानून लागू न होने की शिकायत की जाएगी तो वह उस पर सुनवाई करेगा, अन्यथा स्थितियां जस की तस बनी रहेंगी।

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