दिल्ली हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: पत्रकारिता के नाम पर उत्पात मचाने वालों पर नकेल कसने की जरूरत
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि अब समय आ गया है कि विधायिका एक उचित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पर विचार करे जो प्रेस की आजादी को बनाए रखे और साथ ही पेशेवर जवाबदेही, नैतिक मानकों का सम्मान सुनिश्चित करे। कोर्ट ने यह टिप्पणी दो फ्रीलांस यूट्यूब रिपोर्टरों पर कथित हमले के मामले में दो आरोपियों को जमानत देते हुए की।

सौजन्य से:- Jansatta
दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर बुधवार को अहम टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने प्रेस की आजादी लोकतंत्र का एक जरूरी स्तंभ है, लेकिन इसका इस्तेमाल गैर-जिम्मेदारान पत्रकारिता, डराने- धमकाने धमकी या फिर ऐसी सामग्री फैलाने के लिए ढाल के तौर पर नहीं किया जा सकता, जो कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करे।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस गिरीश कठपालिया ने इस बात पर अफसोस जताया कि सोशल मीडिया के बढ़ते चलन के साथ अब मोबाइल फोन और माइक्रोफोन वाला कोई भी व्यक्ति खुद को रिपोर्टर बता सकता है, जबकि अक्सर उनके पास न तो पत्रकारिता की ट्रेनिंग होती है, न ही नैतिक समझ या जवाबदेही।
हाई कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया कि विधायिका एक उचित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पर विचार करे जो प्रेस की आज़ादी को बनाए रखे और साथ ही पेशेवर जवाबदेही, नैतिक मानकों और कानून के शासन, नागरिकों के अधिकारों और व्यापक जनहित का सम्मान सुनिश्चित करे।
कोर्ट ने यह टिप्पणी शहर के सीमापुरी इलाके की अनधिकृत कॉलोनी में वीडियो रिकॉर्ड कर रहे दो फ्रीलांस यूट्यूब रिपोर्टरों पर कथित हमले के मामले में दो आरोपियों को रेगुलर जमानत देते हुए की।
यह घटना जुलाई 2025 में घटी, जब सीमापुरी में अवैध रूप से निर्मित एक पूजा स्थल के बारे में वीडियो रिकॉर्ड कर रहे दो मीडियाकर्मियों पर भीड़ ने हमला कर दिया। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि भीड़ के सदस्यों ने पत्रकारों के कैमरे की बैटरी और मोबाइल फोन छीन लिए थे।
भीड़ में शामिल पाए गए दो व्यक्ति आबिद अली और फुकरान को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्होंने जमानत के लिए अदालत में अर्जी दी। अली ने आरोप लगाया कि वह महज एक दर्शक था, जबकि फुरकान ने कहा कि वह घटना स्थल पर मौजूद नहीं था।
न्यायालय ने पाया कि प्रेस के सदस्यों ने अपनी समाचार रिपोर्ट के लिए वीडियो बनाते समय स्थानीय निवासियों को स्पष्ट रूप से उत्तेजित किया था। न्यायालय ने कहा कि “स्वयंभू पत्रकार” कभी-कभी अपने समाचार विषयों से आक्रामक रूप से प्रश्न पूछने और भ्रामक कथा गढ़ने की प्रवृत्ति रखते हैं। न्यायालय ने चयनात्मक रिपोर्टिंग, सनसनीखेज खबरों और अपुष्ट आरोपों को प्रकाशित करने के खतरों के संबंध में भी टिप्पणियां कीं।
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आचरण से सामाजिक विभाजन गहरा सकता है, भावनाएं भड़क सकती हैं और कई बार सांप्रदायिक असामंजस्य या सार्वजनिक अव्यवस्था भी उत्पन्न हो सकती है। मीडिया को यह समझना चाहिए कि जनमत को प्रभावित करने की शक्ति के साथ ही संयम, निष्पक्षता और जिम्मेदारी निभाने का अंतर्निहित कर्तव्य भी आता है।
प्रेस रिपोर्टिंग को विनियमित करने के लिए, न्यायालय ने एक ढांचा तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि विधायिका एक उपयुक्त नियामक ढांचे पर विचार करे जो प्रेस की स्वतंत्रता को संरक्षित करते हुए, पेशेवर जवाबदेही, नैतिक मानकों और कानून के शासन, नागरिकों के अधिकारों और व्यापक जनहित के सम्मान को सुनिश्चित करे।
अभियुक्तों को जमानत देते हुए जस्टिस कठपालिया ने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने अदालत के समक्ष झूठा दावा किया था कि अभियुक्त घटना के वीडियो फुटेज में कैद हुए थे और उन्हें मारपीट करते हुए देखा गया था। इसके अलावा, न्यायालय ने इस विरोधाभास को स्पष्ट करने के लिए जांच अधिकारी के उपस्थित न होने पर आपत्ति जताई।
लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में केंद्र सरकार में मंत्री रहे अजय मिश्रा टेनी और उनके पुत्र आशीष मिश्रा को बड़ी राहत मिली है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की। जिसमें बताया कि पूर्व मंत्री अजय मिश्रा टेनी और उनका बेटा लखीमपुर हिंसा के गवाहों को डराने-धमकाने में शामिल नहीं थे और उनके खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है। पढ़ें पूरी खबर।
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