सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के अपहरण‑तस्करी रोकने को तेज करने के लिए केंद्र‑राज्य सरकारों से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका पर केंद्र तथा सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है, जिसमें बाल अपहरण और तस्करी को रोकने के लिये जांच‑प्रक्रिया को मजबूत करने, विशेष अदालतें स्थापित करने और अपराधियों की संपत्ति जब्त करने जैसी मांगें शामिल हैं। याचिका में बताया गया है कि 2013‑2026 में बिहार में प्रति वर्ष लगभग 15 हज़ार लापता बच्चों के केस दर्ज होते हैं, जिसमें केवल आधे से कम बच्चे बरामद होते हैं, और ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में मानव तस्करी की संख्या सबसे अधिक है।

सौजन्य से:- AajTak
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बच्चों के अपहरण और तस्करी की बढ़ती घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई है. कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और सभी संबंधित राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. यह जनहित याचिका वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दाखिल की गई है. याचिका में बच्चों के अपहरण से जुड़े मामलों की जांच और सुनवाई के लिए मौजूदा व्यवस्था को और मजबूत करने की मांग की गई है.
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याचिका में दावा किया गया है कि बच्चों के अपहरण के पीछे कई तरह के संगठित नेटवर्क काम कर रहे हैं. इनमें गैर-कानूनी गोद लेने का रैकेट, इंटरस्टेट चाइल्ड ट्रैफिकिंग नेटवर्क और बच्चों के शोषण से जुड़े गिरोह शामिल हैं. याचिका के मुताबिक, बच्चों को अंगों की ट्रेडिंग और मेडिकल ट्रायल जैसे गैर-कानूनी कामों के लिए भी अगवा किए जाने के मामले सामने आते हैं. इसके अलावा बच्चों को भीख मांगने, बाल मजदूरी, प्रॉस्टिट्यूशन और दूसरे गैर-कानूनी कामों में धकेले जाने का भी आरोप लगाया गया है.
PIL में पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं. याचिका में कहा गया है कि लापता, किडनैप या अगवा किए गए बच्चों के मामलों में पुलिस कई बार तुरंत FIR दर्ज नहीं करती और जांच भी तेजी से नहीं होती. देर से शुरू होने वाली जांच और लंबे समय तक चलने वाले ट्रायल का फायदा संगठित अपहरण और तस्करी से जुड़े गिरोहों को मिलता है. याचिकाकर्ता का कहना है कि इस वजह से ऐसे नेटवर्क अपना गैर-कानूनी कारोबार लंबे समय तक चला पाते हैं.
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याचिका में बच्चों के अपहरण के मामलों की जांच के लिए भी विशेष व्यवस्था बनाने की मांग की गई है. इसके तहत ऐसे मामलों की जांच ACP या SHO स्तर के अधिकारी से कराने का प्रस्ताव रखा गया है. साथ ही अपहरण के मामलों का एक साल के भीतर फैसला करने के लिए MLA-MP कोर्ट की तर्ज पर स्पेशल कोर्ट गठित करने की मांग की गई है. याचिका में अपहरणकर्ताओं के परिवार के सदस्यों की संपत्ति जब्त करने जैसी कार्रवाई का प्रावधान करने की मांग भी की गई है.
याचिका में 1 जून 2026 तक के आंकड़ों का हवाला देते हुए बिहार में बच्चों के लापता होने की स्थिति का भी जिक्र किया गया है. इसके मुताबिक, साल 2013 से बिहार में हर साल करीब 15 हजार मिसिंग केस दर्ज होते हैं. याचिका में दावा किया गया है कि इनमें बड़ी संख्या बच्चों की होती है और मुश्किल से करीब 50 फीसदी बच्चे ही बरामद हो पाते हैं. याचिका में इन आंकड़ों को बच्चों की सुरक्षा और उनकी तलाश के लिए मौजूदा व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत से जोड़कर पेश किया गया है.
याचिका में NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए मानव तस्करी के मामलों को लेकर भी चिंता जताई गई है. इसके मुताबिक, ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में मानव तस्करी के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं. नाबालिग लड़कों की तस्करी के सबसे ज्यादा मामले ओडिशा में बताए गए हैं, जबकि इसके बाद बिहार का नंबर आता है. वहीं नाबालिग लड़कियों की तस्करी के मामलों में राजस्थान सबसे आगे बताया गया है.
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PIL के मुताबिक, तस्करी के शिकार बच्चों को अलग-अलग गैर-कानूनी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाता है. इनमें भीख मंगवाना, बाल मजदूरी और प्रॉस्टिट्यूशन जैसे काम शामिल हैं. याचिका में कहा गया है कि बच्चों को ऐसे अपराधों के लिए मजबूर किए जाने से उनकी सुरक्षा और भविष्य दोनों पर गंभीर असर पड़ता है. इसी वजह से अपहरण और तस्करी के मामलों में तेज जांच और समयबद्ध न्याय की जरूरत पर जोर दिया गया है.
याचिका में 5 जून 2026 को दिल्ली पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई का भी उदाहरण दिया गया है. इसके मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार किया था और पुलिस के अनुसार यह नेटवर्क दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात समेत पांच राज्यों में सक्रिय था. पुलिस के मुताबिक, गिरोह EWS और BPL परिवारों से नवजात बच्चों को किडनैप करता था और उन्हें गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए 8 से 10 लाख रुपये तक में बेचता था. याचिका में इस तरह के मामलों को बच्चों के अपहरण और तस्करी के संगठित नेटवर्क की गंभीरता के उदाहरण के तौर पर रखा गया है.
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