शादी का वादा तोड़ना स्वभाविक नहीं, अपराध तभी जब शुरू से झूठा इरादा हो: सुप्रीम कोर्ट का नया दिशानिर्देश
गुजरात के सयाजीगंज में दर्ज केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी का वादा तोड़ना हर बार अपराध नहीं माना जाएगा, जब तक वादे के समय से धोखा देने का इरादा न हो। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में माँ की अनुमति न मिलने के कारण शादी नहीं हुई, इसलिए FIR को रद्द किया गया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
शादी का वादा, बनाए संबंध...मुकरने पर FIR
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार Kunal Rameshbhai Kalyani v State of Gujarat & Anr. का मामला गुजरात के सयाजीगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा था। आरोपी के खिलाफ BNS की धारा 69 के तहत आरोप लगाया गया था कि उसने शादी का वादा करके शिकायतकर्ता के साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया। आरोपी का कहना था कि उसकी मां इस शादी के लिए तैयार नहीं थी। और मां की अनुमति न मिलने की वजह से उसने शादी से मजबूरन इंकार किया। मामले में BNS की धारा 69 के तहत दर्ज FIR को खारिज कराने की याचिका जब गुजरात हाईकोर्ट में पहुंची तो, हाई कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर...दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया। फिर जिसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।सुप्रीम कोर्ट का फैसला और BNS की धारा 69 की व्याख्या
- वादा करते समय नीयत क्या थी: कोर्ट के सामने यही सवाल सबसे खास था ।अगर आरोपी ने शुरू से शादी करने का इरादा नहीं रखा और सिर्फ यौन संबंध बनाने के लिए शादी का झूठा वादा किया, तो BNS की धारा 69 लागू हो सकती है। लेकिन अगर वादा सच्चा था और बाद में परिस्थितियों के कारण शादी नहीं हो सकी, तो इसे हर बार अपराध नहीं माना जाएगा।
- इस मामले में धोखा क्यों नहीं: आरोपी और महिला की मुलाकात ऑनलाइन हुई थी और बाद में दोनों के बीच संबंध बने। शिकायत में यह साफ नहीं था कि शादी के वादे के कारण ही पहली बार शारीरिक संबंध बने। आरोपी नेबाद में अपनी मां की सहमति नहीं मिलने के कारण शादी से इनकार किया, इसलिए कोर्ट को शुरुआत से धोखा देने की नीयत नहीं दिखी।
- 'शादीनहीं हुई' और 'झूठा वादा' अलग: सिर्फ शादी का वादा पूरा न होने से यह साबित नहीं होता कि वादा शुरू से झूठा था। अदालत यह देखती है कि वादा करते समय आरोपी की शादी करने की नीयत थी या नहीं। इसलिए शादी का वादा टूटना और शुरू से झूठा वादा करना कानूनी तौर पर अलग-अलग स्थितियां हैं।
- नीयत खराब नहीं, FIR रद्द: जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ किया कि किसी भी हाल में शिकायत यही है कि अपीलकर्ता ने बाद में शादी करने से मना किया, क्योंकि उसकी माँ ने इजाज़त नहीं दी थी; इससे पता चलता है कि अगर वादा किया भी गया था, तो वह पूरी नेक नीयत से किया गया। और फिर आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने का आदेश जारी कर दिया।
पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी यही सिद्धांत
- दरअसल...सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा है कि लंबे समय तक चले सहमति वाले रिश्ते को केवल इसलिए बाद में अपराध नहीं माना जा सकता कि वह शादी में तब्दील नहीं हुआ। Mahesh Damu Khare मामले में कोर्ट ने कहा था कि यौन संबंध और कथित झूठे विवाह वादे के बीच सीधा संबंध होना चाहिए।
- वहीं नवंबर 2025 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक चले भावनात्मक और सहमति वाले रिश्ते को केवल शादी न होने के कारण पीछे मुड़कर बलात्कार का अपराध नहीं बनाया जा सकता, हां..यदि शुरुआत से ही वादा झूठा और बदनीयती से किया गया हो तो स्थिति अलग होगी।
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