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सुप्रीम कोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण फैसला: एनसीएससी के पास आदेश देने की न्यायिक शक्ति नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने एनसीएससी को सेवा मामलों में बाध्यकारी आदेश जारी करने की न्यायिक शक्ति से वंचित कर दिया है। आयोग की भूमिका को सिफारिशी और सलाहकारी बताया गया है।

28 जुलाई 2026 को 04:54 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण फैसला: एनसीएससी के पास आदेश देने की न्यायिक शक्ति नहीं

सौजन्य से:- Hindustan

एनसीएससी के पास आदेश देने की न्यायिक शक्ति नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) की सेवा मामलों में बाध्यकारी आदेश जारी करने की न्यायिक शक्ति नहीं है। यह आयोग केवल सिफारिशी और सलाहकारी भूमिका में है, न कि न्यायिक। इस फैसले ने मुंबई पोर्ट अथॉरिटी के मामले में आयोग के आदेश को चुनौती दी जो प्रमोशन से जुड़े लाभों से संबंधित था।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के पास सेवा मामलों में बाध्यकारी आदेश पारित करने की न्यायिक शक्ति नहीं है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के तहत इसकी भूमिका सिफारिशी और सलाहकारी है, न्यायिक नहीं। जस्टिस संजय करोल और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि ‘एनसीएससी एक संवैधानिक निकाय है जिसे संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत स्थापित किया गया था, ताकि अनुसूचित जातियों के सदस्यों के सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक हितों की शोषण से रक्षा की जा सके। हालांकि पीठ ने कहा कि एनसीएससी को दी गई शक्तियां सीमित हैं और यह साफ है कि एनसीएससी अनुच्छेद 338ए और 338बी के तहत इसके सहयोगी निकाय सामाजिक भलाई के उद्देश्य वाले संवैधानिक निकाय हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से विधायिका ने इनकी भूमिका सिफारिशी और सलाहकारी तय की है, न कि न्यायिक।

इनका काम न्यायिक कार्यों को अपने हाथ में लेना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी सवाल पर विचार कर रही थी कि क्या एनसीएससी सेवा से जुड़े मामलों में आदेश जारी कर सकता है और क्या ऐसे आदेश केवल निर्देश देने वाले होते हैं या अनिवार्य होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पोर्ट अथॉरिटी की अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें आयोग के आदेश को सही ठहराया गया था। आयोग ने पोर्ट अथॉरिटी को निर्देश दिया था कि वह एक अनुसूचित जाति के कर्मचारी को प्रमोशन से जुड़े लाभ दे और 30 दिनों में बकाया राशि का भुगतान करे। यह मामला मुंबई पोर्ट अथॉरिटी की कर्मचारी माधवी के. चंदोरकर के पद कम करने से जुड़ा था।

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