समय पर प्रीमियम न भरें तो बीमा क्लेम से बंचेंगे, सुप्रीम कोर्ट ने किया स्पष्ट निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीमा पॉलिसी का प्रीमियम जोखिम शुरू होने से पहले ही देना अनिवार्य है, नहीं तो बीमा कंपनी को नुकसान की भरपाई करनी नहीं पड़ेगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमा अधिनियम की धारा 64VB के तहत बिना भुगतान के बीमाकर्ता को कोई जिम्मेदारी नहीं होगी, चाहे अधिकारी का ई‑मेल या मौखिक आश्वासन हो। इस फैसले में न्यू इंडिया एश्योरेंस और लुई ड्रेफस की बीमा विवाद को उदाहरण के तौर पर लिया गया।

सौजन्य से:- ABP News
अब समय पर प्रीमियम भरना है जरूरी, ग्राहक को सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिला क्लेम
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीमा पॉलिसी का प्रीमियम समय पर जमा करना जरूरी है. जोखिम शुरू होने से पहले भुगतान न होने पर कंपनी नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदार नहीं होगी.
अगर आपने भी किसी तरह की बीमा पॉलिसी ले रखी है, तो समय पर प्रीमियम जमा करना बेहद जरूरी है. इसी मुद्दे को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. इस फैसले से कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि अगर बीमा जोखिम शुरू होने से पहले जरूरी प्रीमियम का पेमेंट नहीं किया गया है, तो बीमा कंपनी को उस नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.
इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 64VB के तहत बीमाकर्ता तब तक किसी जोखिम की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता है, जब तक प्रीमियम का भुगतान नहीं हो जाता या उसकी गारंटी तय नियमों के मुताबिक नहीं दी जाती. यानी सिर्फ किसी अधिकारी के भरोसे या ईमेल के आधार पर बिना कवरेज को नहीं बढ़ाया जा सकता है.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, यह मामला न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और लुई ड्रेफस कमोडिटीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है. कंपनी ने साल 2010 में समुद्री कार्गो वार्षिक बीमा पॉलिसी ली थी. हालांकि, इस पॉलिसी में सालाना कारोबार की सीमा 1,200 करोड़ रुपए तय थी. इस प्रीमियम को दो किस्तों में जमा करना था, यानी 6 महीने में कारोबार सीमा 600 करोड़ रुपए थी. लेकिन नवंबर 2010 में कंपनी के कपास के हजारों गट्ठों में अचानक आग लग गई, जिससे उन्हें करीब 22 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.
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ऐसे में बीमा कंपनी ने क्लेम देने से इनकार कर दिया, क्योंकि उनका कहना था कि आग लगने से पहले ही कारोबार तय सीमा से ज्यादा हो चुका था और अतिरिक्त जोखिम के लिए कुछ जरूरी प्रीमियम जमा नहीं किया था.
कंपनी ने क्यों मांगा था क्लेम?
कंपनी ने कहा कि बीमा कंपनी के एक अधिकारी ने ईमेल के जरिए भरोसा दिलाया था कि कारोबार सीमा बढ़ने के बाद भी पॉलिसी जारी रहेगी. साथ ही कंपनी ने बताया कि दूसरी प्रीमियम किस्त जमा करने के बाद सभी ट्रांजिट कवर पॉलिसी की अवधि तक लागू रहेंगे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि किसी अधिकारी का ईमेल कानून में तय शर्तों को बदल नहीं सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बीमा पॉलिसी की सीमा पार होने के बाद कंपनी को अतिरिक्त प्रीमियम जमा करना बेहद जरूरी था. ऐसे में सिर्फ किसी अधिकारी के ईमेल से बीमा क्लेम नहीं बढ़ सकता है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि इस मामले में कारोबार सीमा जुलाई 2010 में ही पार हो चुकी थी, जबकि अतिरिक्त प्रीमियम जमा बाद में किया गया. इसलिए आग लगने की घटना के समय बीमा कवरेज लागू नहीं माना जा सकता है.
बीमा ग्राहक इन बातों का रखें ध्यान
- बीमा पॉलिसी का प्रीमियम हमेशा समय पर जमा करें.
- पॉलिसी की शर्तों और कवरेज लिमिट को ध्यान से पढ़ें.
- केवल मौखिक आश्वासन या ईमेल पर निर्भर न रहें.
- अगर जोखिम या संपत्ति की वैल्यू बढ़ रही है, तो समय पर बीमा कवरेज अपडेट कराएं.
- आप अपना कवरेज बढ़ाना चाहते हैं, तो पहले अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान करें.
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