सुप्रीम कोर्ट में अभी तक कानून के विद्वानों की नियुक्ति नहीं हुई
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 124(3) के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर किसी कानून के जानकार को नियुक्त किया जा सकता है, पर 76 वर्षों से अब तक ऐसा नहीं हुआ है। उन्होंने कारणों के तौर पर केंद्र सरकार एवं कॉलेजियम की गहराई की कमी पर शंका जताई और कहा कि यदि विधि शिक्षाविदों को मौका मिला तो वे बेंच को नई दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
अफ़सोस की बात है कि लीगल एकेडमी के क्षेत्र से किसी को भी सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया गया: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
Shahadat
30 Aug 2026 10:13 PM IST
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने एक कार्यक्रम में कहा कि संविधान में इजाज़त होने के बावजूद, पिछले 76 सालों में किसी भी कानून के जानकार (ज्यूरिस्ट) को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया गया।
NLU दिल्ली में LLM प्रोग्राम के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए जज ने कहा,
"हालांकि हमारे संविधान में सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर किसी कानून के जानकार की नियुक्ति का प्रावधान है, लेकिन संविधान के 76 साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी अब तक सुप्रीम कोर्ट में किसी कानून के जानकार को नियुक्त नहीं किया गया... एक जाने-माने कानून के जानकार बेंच के लिए बहुत मूल्यवान साबित हो सकते हैं। अपनी विद्वता से वे शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में अहम योगदान दे सकते हैं। जाने-माने कानूनी शिक्षाविदों और विद्वानों की भागीदारी का सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक कामकाज पर गहरा असर पड़ेगा।"
जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर जाने-माने कानून के जानकारों की कल्पना की थी, लेकिन या तो केंद्र सरकार और कॉलेजियम ने अब तक इस पहलू पर विचार नहीं किया, या फिर वे भारतीय शिक्षाविदों को सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के लिए ज़रूरी गहराई की कमी वाला मानते हैं।
उन्होंने आगे कहा,
"इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि पहले, जब कॉलेजियम सिस्टम नहीं था, तो केंद्र सरकार की नज़र में, और उसके बाद, जब कॉलेजियम सिस्टम आया, तो कॉलेजियम की नज़र में, भारतीय शिक्षाविदों में सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के लिए गंभीरता से विचार किए जाने लायक पर्याप्त गहराई नहीं है। दूसरा कारण, जिसकी ज़्यादा संभावना है, वह यह है कि केंद्र सरकार और कॉलेजियम दोनों ने अब तक इस प्रावधान पर गंभीरता से विचार नहीं किया... हमारे गणतंत्र के निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर जाने-माने कानून के जानकारों की कल्पना की थी... यह अफ़सोस की बात है कि यह प्रावधान हमारे संविधान के इस्तेमाल न किए गए प्रावधानों में से एक बना हुआ है।"
जज ने कहा कि आम तौर पर हाईकोर्ट के सीनियर जज या चीफ जस्टिस को ही सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया जाता रहा है। कभी-कभी बार (वकीलों) से सीधे नियुक्तियां भी हुई हैं, जो "बेहतरीन" साबित हुईं। फिर भी "अब तक किसी भी कानूनी शिक्षाविद को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त नहीं किया गया, जबकि ऐसे कई प्रतिभाशाली लोग मौजूद हैं, जो बेंच का हिस्सा बनने पर अहम योगदान दे सकते हैं।"
जस्टिस भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर जाने-माने कानून विशेषज्ञों (Jurists) की नियुक्ति के खिलाफ़ दिए गए इस तर्क को "सतही" (Shallow) बताकर खारिज कर दिया कि उनमें व्यावहारिक अनुभव की कमी होती है।
उन्होंने कहा,
"सुप्रीम कोर्ट न केवल सबसे बड़ी न्यायिक संस्था है, बल्कि यह देश की नैतिक, कानूनी और संवैधानिक चेतना का संरक्षक भी है। यह तकनीकी बारीकियों से ऊपर है। जाने-माने कानून विशेषज्ञों के लिए यह प्रावधान इसलिए रखा गया ताकि बेंच में प्रतिभाशाली जज शामिल हो सकें। माना जाता था कि अपनी अकादमिक विद्वता के कारण, इस श्रेणी के विशेषज्ञ संकीर्ण तकनीकी बारीकियों तक सीमित नहीं रहेंगे और इस तरह सार्वजनिक कानून के मुद्दों से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में होंगे।"
जस्टिस भुइयां के अनुसार, हालांकि "जाने-माने कानून विशेषज्ञ" (Distinguished Jurist) कोई तय परिभाषा वाला शब्द नहीं है, लेकिन इसका मतलब उन सभी प्रतिष्ठित लोगों से है जो कानून की प्रैक्टिस, शिक्षण और शोध में शामिल हैं। जज ने कहा, "किसी व्यक्ति को जाने-माने कानून विशेषज्ञ के तौर पर पहचाने जाने के लिए अदालत में कानून की प्रैक्टिस करना ज़रूरी नहीं है।"
उन्होंने आगे कहा कि हालांकि वकीलों और जजों को कानून विशेषज्ञ माना जा सकता है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 124(3) के संदर्भ में, इस शब्द का दायरा इन दो श्रेणियों से कहीं आगे होना चाहिए।
जज ने कहा,
"कोई व्यक्ति जो कानून में कुशल हो या कानून के क्षेत्र का जानकार हो, उसे कानून विशेषज्ञ कहा जा सकता है।"
इस संबंध में जस्टिस भुइयां ने बताया कि अमेरिकी संविधान में किसी व्यक्ति को संघीय अदालत का जज नामित करने के लिए औपचारिक लॉ डिग्री की भी आवश्यकता नहीं होती है। उन्होंने गौर किया कि जहां भारत में BCI के नियम अकादमिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति को वकील के तौर पर प्रैक्टिस करने से रोकते हैं, वहीं अमेरिका में एक पूर्णकालिक प्रोफेसर भी कानून की प्रैक्टिस कर सकता है, बशर्ते उनकी प्रैक्टिस से अकादमिक सत्र प्रभावित न हों।
अमेरिका के इतिहास से जस्टिस भुइयां ने फेलिक्स फ्रैंकफर्टर (हार्वर्ड में कानून के प्रोफेसर, जो मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया के थे), सैमुअल मिलर (चिकित्सक) और रूथ बेडर गिन्सबर्ग के उदाहरण दिए, जिन्हें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर नामित किया गया। जज ने यह भी कहा कि ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा और केन्या में भी कानूनी शिक्षाविदों को शीर्ष अदालतों में जज के तौर पर नियुक्त किया जा सकता है।
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