गाली-गलौज का मतलब हर बार अश्लीलता नहीं, ये कोर्ट का फैसला है
कोर्ट ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा जब वह कामुकता को बढ़ावा देने वाला हो या लोगों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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सुप्रीम कोर्ट बोला- गाली देना हर बार अश्लीलता नहीं होती:अभद्र भाषा और अश्लीलता अलग, मां की गाली भी हर मामले में क्राइम नहीं
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना हमेशा अश्लीलता के दायरे में नहीं आता है। शुक्रवार को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा, जब वह कामुकता को बढ़ावा देने वाला हो या लोगों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो।
कोर्ट ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक मामले में सुनवाई के दौरान की। आरोपी मणि को जमीन विवाद के दौरान मां की गाली देने के लिए अश्लीलता के आरोप में दोषी ठहराया गया था।
जमीन के विवाद में गाली-गलौज और जातिसूचक शब्द बोले थे
अगस्त 2017 में जमीन विवाद को लेकर आरोपी ने शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज की थी। पीड़ित का आरोप था कि आरोपी ने जातिसूचक शब्दों भी कहे। बाद में घर से हथियार लाकर हमला कर दिया, जिससे उसकी नाक की हड्डी टूट गई थी।
निचली अदालत ने उसे अश्लीलता, गंभीर चोट और धमकी के लिए दोषी माना था।
सुप्रीम कोर्ट ने अश्लीलता और आपराधिक धमकी (IPC की धारा 506) के आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि गाली देने से किसी को परेशानी हुई, यह साबित नहीं हुआ। हालांकि, शिकायतकर्ता को गंभीर चोट पहुंचाने (IPC की धारा 326) के मामले में उसकी सजा बरकरार रखी गई है।
आरोपी की उम्र करीब 70 साल होने और स्वास्थ्य स्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसकी सजा को घटाकर 'कोर्ट उठने तक की कैद' कर दिया है। साथ ही, उसे 2 महीने के भीतर 50,000 रुपए का जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया है।
पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में वकील ने CJI का नाम लेकर अपशब्द कहे थे
10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक वकील ने हंगामा किया। सीजेआई सूर्यकांत को अपशब्द कहे और फाइल भी फेंकी। इस दौरान सीजेआई कोर्ट रूम में मौजूद नहीं थे।
यह घटना जस्टिस केवी विश्वनाथन, जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने हुई। हंगामे के बाद कोर्ट के आदेश पर सिक्योरिटी ने वकील को तुरंत बाहर निकाल दिया।
जब उस याचिकाकर्ता वकील ने अभद्रता शुरू की, तब कोर्ट रूम में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। दिल्ली पुलिस वकील को पूछताछ के लिए ले गई है।
सुप्रीम कोर्ट में अभद्रता के मामले
सुप्रीम कोर्ट में कभी-कभार किसी वकील द्वारा बहस के दौरान ऊंची आवाज, तीखी बहस या अनुचित टिप्पणी के मामले सामने आए हैं, लेकिन CJI पर शारीरिक हमला या कोर्ट रूम के अंदर गंभीर अभद्रता जैसी घटनाएं सार्वजनिक रिकॉर्ड में मिलती ही नहीं हैं। CJI से अभद्रता की अबतक केवल 2 घटनाओं का जिक्र मिलता है…
1999 – CJI एएस आनंद पर एडवोकेट नंदलाल बलवानी ने जूता फेंका: तत्कालीन CJI एएस आनंद की बेंच के सामने एक वकील ने नारेबाजी की और कोर्ट रूम में जूता फेंका। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर आपराधिक अवमानना माना और उन्हें 4 महीने की जेल और जुर्माने की सजा सुनाई। 1999 में सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में फोटोग्राफी या वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं थी। उस समय कोर्ट की कार्यवाही का लाइव प्रसारण भी नहीं होता था। इसलिए घटना का विवरण केवल न्यायालय के आदेश और खबरों में दर्ज है।
6 अक्टूबर 2025 – CJI बीआर गवई के कोर्ट रूम में जूता फेंकने की घटना
एक वकील ने सुनवाई के दौरान CJI बीआर गवई की ओर जूता फेंका और नारे लगाए। जूता CJI को नहीं लगा। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत आरोपी को हिरासत में ले लिया। इसके बाद बार काउंसिल ने भी अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की। बाहर जाते वक्त वकील ने नारा लगाया- सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान।
घटना के बाद CJI ने अदालत में मौजूद वकीलों से अपनी दलीलें जारी रखने को कहा। उन्होंने कहा कि इस सबसे परेशान न हों। मैं भी परेशान नहीं हूं, इन चीजों से मुझे फर्क नहीं पड़ता। पढ़ें पूरी खबर…
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9 साल जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत:सुप्रीम कोर्ट बोला- घटना के समय किशोर था, आरोप लगा; केस में देरी उसकी गलती नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 9 साल से जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में असाधारण देरी ने हमारी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है। ऐसे मामलों की सुनवाई में तेजी लाना अदालतों की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने कहा, याचिकाकर्ता घटना के समय किशोर था। अब तक 9 साल बीते गए। इस स्पीड से ट्रायल पूरा होने में अभी और समय लगेगा। पूरी खबर पढ़ें…
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