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क्या दाखिल-खारिज करा लेने से ही मिल जाएगा जमीन का मालिकाना हक? सुप्रीम कोर्ट ने किया साफ

क्या दाखिल-खारिज करा लेने से ही मिल जाएगा जमीन का मालिकाना हक? सुप्रीम कोर्ट ने किया साफ Land Ownership Rules: सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कह दिया है कि म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया है. जमीन के मालिकान…

24 अगस्त 2026 को 05:54 am बजे
क्या दाखिल-खारिज करा लेने से ही मिल जाएगा जमीन का मालिकाना हक? सुप्रीम कोर्ट ने किया साफ

सौजन्य से:- ABP News

क्या दाखिल-खारिज करा लेने से ही मिल जाएगा जमीन का मालिकाना हक? सुप्रीम कोर्ट ने किया साफ

Land Ownership Rules: सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कह दिया है कि म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया है. जमीन के मालिकाना हक से इसका कोई लेना-देना नहीं है.

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, राजस्व रिकॉर्ड से मालिकाना हक नहीं मिलता.

- ये रिकॉर्ड केवल वित्तीय उद्देश्यों के लिए होते हैं, कानूनी अधिकार नहीं.

- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला पलटा, दीवानी अदालत निर्णायक.

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20 अगस्त) को एक मामले की सुनवाई करते हुए यह साफ-साफ कह दिया कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में एंट्री करने से मात्र से किसी अचल संपत्ति पर किसी का मालिकाना हक न तो बनता है और न ही खत्म होता है.

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक संयुक्त परिवार की कृषि भूमि (Agricultural Land) के मालिकाना हक के विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया.

क्या था मामला?

मामला मूल रूप से एक जमीन विवाद से जुड़ा हुआ है, जिसका असली मालिक भगवान सिंह नाम का एक व्यक्ति था. अब जब भगवान सिंह की मृत्यु हुई, तो जमीन उनके दो बेटों- रामप्रसाद और वासुदेव के नाम पर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुई. बाद में रिकॉर्ड रेवेन्यू में किसी एक का नाम दर्ज होने के आधार पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दूसरे पक्ष के मालिकाना हक को खारिज कर दिया.

अब जब सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई हुई, तो कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रॉपर्टी का टाइटल सिर्फ़ रेवेन्यू रिकॉर्ड के आधार पर तय नहीं किया जा सकता और इसे दूसरे सबूतों के साथ भी देखा जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?

जस्टिस संजय करोल और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने मध्य प्रदेश HC के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में एंट्री न तो टाइटल बनाती है और न ही खत्म करती है और यह मुख्य रूप से वित्तीय उद्देश्यों के लिए मौजूद है. यानी कि जमीन का असली मालिकाना हक तय करने के लिए केवल राजस्व रिकॉर्ड काफी नहीं है, बल्कि उसके साथ रजिस्ट्री या अन्य पुख्ता सबूतों का भी होना जरूरी है.

कोर्ट ने कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने का मकसद सरकार को जमीन के लिए टैक्स चुकाने वाले व्यक्ति की पहचान करना होता है. प्रॉपर्टी के असली मालिकाना हक को लेकर अगर कोई विवाद है, तो इसे सुलझाने का अधिकार सिर्फ दीवानी अदालत के ही पास है. तहसीलदार या रेवेन्यू विभाग के अधिकारियों के पास मालिकाना हक तय करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता है.

फिर कैसे माना जाएगा कानूनी अधिकार?

प्रॉपर्टी पर आपका असली कानूनी अधिकार तभी माना जाएगा, जब रजिस्टर्ड सेल डीड (Registry), गिफ्ट डीड, या लीज डीड में आपका नाम हो या आपके नाम पर कोई वैध वसीयत हो या फिर सिविल कोर्ट द्वारा आपको उस प्रॉपर्टी का मालिक घोषित किया गया हो.

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