सुप्रीम कोर्ट ने जिला जज के 'शो‑कोज़ नोटिस' को हाईकोर्ट में ही सुनवाई करने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने सिक्किम के एक जिला जज द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई नहीं की और कहा कि 'शो‑कोज़ नोटिस' से संबंधित मामला केवल हाईकोर्ट में निपटा जा सकता है। बेंच ने जज प्रज्वल खतिवाड़ा को हाईकोर्ट में अपील करने की अनुमति दी और बताया कि रिटायर हुए जजों के खिलाफ शिकायत का निपटारा हाईकोर्ट की पूर्ण बेंच के पास ही है।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
जिला जज को हाईकोर्ट का 'शो-कॉज़ नोटिस': सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हाईकोर्ट में ही करें अपील
Shahadat
10 Sept 2026 9:53 AM IST
सुप्रीम कोर्ट ने सिक्किम के एक मौजूदा ज़िला जज की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। इस याचिका में उन्हें जारी किए गए 'शो-कॉज़ नोटिस' को चुनौती दी गई थी। यह नोटिस कथित तौर पर हाईकोर्ट के जज (जो अब रिटायर हो चुके हैं) के ख़िलाफ़ उनकी शिकायत के बाद जारी किया गया।
हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ता-जज प्रज्वल खतिवाड़ा को सिक्किम हाई कोर्ट जाने की छूट दी।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट मनोज गोयल ने दावा किया कि 'शो-कॉज़ नोटिस' याचिकाकर्ता को उनके जूनियर ने जारी किया, न कि 'फुल कोर्ट' या हाई कोर्ट की कमेटी ने। साथ ही यह नोटिस सिर्फ़ याचिकाकर्ता को भेजा गया, रजिस्ट्रार जनरल को भी नहीं।
सीनियर वकील ने तर्क दिया,
"मैं [रिटायर हो चुके] चीफ जस्टिस के अधीन काम करने वाला रजिस्ट्रार जनरल हूं। रिटायरमेंट के अगले ही दिन मुझे बाहर भेज दिया गया, हटा दिया गया। उसके अगले दिन मेरे ख़िलाफ़ शिकायत की गई, जिसे 'शो-कॉज़ नोटिस' का आधार बनाया गया और इसे ऐसे व्यक्ति ने जारी किया जो इसके लिए [अधिकृत/योग्य] नहीं है।"
दीपाली शर्मा केस का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ़ हाईकोर्ट या उसकी कमेटी को ही 'शो-कॉज़ नोटिस' जारी करने का अधिकार है। उन्होंने यह भी बताया कि सिक्किम हाईकोर्ट की 'फुल कोर्ट' में सिर्फ़ दो जज होने की वजह से क्या दिक्कतें आ सकती हैं।
यह देखते हुए कि जिस हाईकोर्ट जज के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ता ने शिकायत की थी और संबंधित चीफ जस्टिस, दोनों ही रिटायर हो चुके हैं, बेंच ने याचिकाकर्ता से हाईकोर्ट जाने को कहा।
CJI कांत ने गोयल से कहा,
"आपकी शिकायत एक पूर्व जज के ख़िलाफ़ है, जो अब रिटायर हो चुके हैं... हो सकता है कि उनकी शिकायत यह रही हो कि आपको तत्कालीन चीफ जस्टिस से अनुचित संरक्षण मिल रहा था... वे भी रिटायर हो चुके हैं। अब जो भी जज बचे हैं, वे इस मामले की न्यायिक पक्ष (ज्यूडिशियल साइड) से सुनवाई करेंगे।"
जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट मामले के गुण-दोष (मेरिट्स) पर तभी विचार कर सकता है, जब हाईकोर्ट न्यायिक पक्ष से इसकी सुनवाई करने में असमर्थ हो। लेकिन पहली दलील (हाईकोर्ट की फुल बेंच में हितों के टकराव/कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट के बारे में) में कोई दम न मिलने के कारण कोर्ट मामले के गुण-दोष पर विचार करने का इच्छुक नहीं था। इसलिए याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट के सामने अपनी शिकायत रखने की छूट दे दी गई।
याचिका में कही गई बातों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने 2005 में ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा में टॉप करने के बाद सिक्किम ज्यूडिशियल सर्विस जॉइन की थी। ज्यूडिशियल सर्विस में उनका 21 साल का बेदाग़ रिकॉर्ड रहा और उन्होंने फरवरी 2023 से दिसंबर 2025 तक हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के तौर पर काम किया।
आरोप है कि 2025 के आखिर में हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज के ख़िलाफ़ शिकायत करने के बाद उन्हें बदले की भावना से की गई कार्रवाई और बार-बार परेशान किए जाने का सामना करना पड़ा। जिस हाईकोर्ट जज के ख़िलाफ़ शिकायत की गई, उन्हें एक्टिंग चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया और उस नियुक्ति के बाद से ही याचिकाकर्ता का अचानक ट्रांसफर कर दिया गया, सुरक्षा हटा ली गई, निजी मामलों की जांच की गई और ACR (एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट) को नष्ट कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उनके और उनके परिवार के सदस्यों के ख़िलाफ़ कुछ गुमनाम शिकायतें भी फैलाई गईं, जिनमें "बेबुनियाद और गैर-जिम्मेदाराना" आरोप लगाए गए। इस साल जुलाई में, उन्हें 22 आरोपों वाला 'स्टेटमेंट ऑफ़ एलिगेशन' (आरोपों का विवरण) दिया गया।
याचिकाकर्ता ने कहा कि न केवल आरोप झूठे और मनगढ़ंत थे, बल्कि आरोपों के विवरण के साथ कोई भी दस्तावेज़ या सबूत न दिए जाने के कारण वह इसका पूरा जवाब भी नहीं दे पाए। आखिरकार, उन्हें 'शो-कॉज़ नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) भेजा गया, जिसमें बताया गया कि फुल कोर्ट ने उनके जवाब को "असंतोषजनक" पाया है।
शो-कॉज़ नोटिस, आरोपों के विवरण और बदले की भावना से की गई अन्य कार्रवाइयों को चुनौती देते हुए, और साथ ही गायब ACR की जांच की मांग करते हुए, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
Case Title: PRAJWAL KHATIWADA v. HIGH COURT OF SIKKIM AND ORS.
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