सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गाली-गलौज अश्लीलता नहीं!
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा कि गाली-गलौज अश्लीलता नहीं है। कोर्ट ने व्यक्ति की सजा कम की और जुर्माना लगाया। कोर्ट ने बताया कि गाली-गलौज से घृणा तो हो सकती है, लेकिन यह अश्लीलता नहीं मानी जा सकती।

सौजन्य से:- Hindustan
गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अश्लीलता नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक भूमि विवाद में कहा कि गाली-गलौज अश्लीलता नहीं है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 70 वर्षीय व्यक्ति की सजा कम की और ₹50,000 का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने कहा कि गाली-गलौज से घृणा तो हो सकती है, लेकिन यह अश्लीलता नहीं मानी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने जमीनी विवाद में फैसला सुनाते हुए कहा कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अश्लीलता नहीं है। शीर्ष अदालत ने साफ किया कि कानून की नजर में अश्लीलता, अभद्रता, गाली-गलौज या अपशब्दों से अलग है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने जमीन के विवाद से जुड़े एक मामले में दोषी ठहराए गए तमिलनाडु के 70 वर्षीय व्यक्ति की अपील स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने ‘सार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्द बोलना’ और ‘आपराधिक धमकी’ के तहत उसकी सजा रद्द कर दी, लेकिन खतरनाक हथियार से जान-बूझकर गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में उसकी सजा बरकरार रखी। शीर्ष अदालत ने अपीलकर्ता की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए सजा को बदलकर ‘कोर्ट के उठने तक की कैद’ कर दी और ₹50,000 का जुर्माना भरने का निर्देश दिया। अश्लीलता और भद्देपन के बीच अंतर बताते हुए पीठ ने कहा कि कानूनी तौर पर अश्लीलता का मतलब ‘भद्देपन’, ‘गाली-गलौज’ या ‘अपशब्दों’ का इस्तेमाल नहीं है। सिर्फ गाली-गलौज, अपशब्दों और भद्दी बातों का इस्तेमाल, चाहे वे कितनी भी बुरी या असभ्य क्यों न हों, उन्हें अश्लीलता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने समझाया कि जो शब्द सिर्फ गाली-गलौज वाले या अपमानजनक होते हैं, उनसे घृणा, नफरत या हैरानी तो हो सकती है, लेकिन कानून की नजर में अश्लील नहीं हो जाते। कोर्ट ने यह भी पाया कि इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं था कि कही गई बातों से किसी सार्वजनिक जगह पर दूसरों को परेशानी हुई हो, जो कि इस अपराध के लिए एक जरूरतमंद शर्त है。
यह था मामला
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि अगस्त 2017 में जमीन के विवाद को लेकर हुई बहस के दौरान, अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को अभद्र भाषा में गालियां दीं और उस पर बिलहुक (एक तरह का हथियार) से हमला किया, जिससे उसे कई चोटें आईं, जिसमें नाक की हड्डी टूट गई। ट्रायल कोर्ट ने उसे आईपीसी और एससी/एसटी अधिनियम के तहत दोषी ठहराया, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने बाद में उसे बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 294(बी), 326 और 506(II) के तहत उसकी सजा बरकरार रखी।
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