झारखंड हाईकोर्ट ने ज़मीन विवाद में दाखल देने से इनकार किया
झारखंड हाईकोर्ट ने ज़मीन विवाद के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जारी प्रशासनिक आदेश में दखल देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि ज़मीन पर कब्ज़े और पहचान जुड़े विवादित सवालों का निपटारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
झारखंड हाईकोर्ट ने ज़मीन विवाद के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जारी प्रशासनिक आदेश में दखल देने से इनकार किया
Shahadat
11 July 2026 9:52 AM IST
झारखंड हाईकोर्ट ने ज़मीन विवाद के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सब-डिविजनल ऑफिसर (SDO) द्वारा जारी प्रशासनिक आदेश में दखल देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि ज़मीन पर कब्ज़े और उसकी पहचान से जुड़े विवादित सवालों का निपटारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि ऐसे विवादों के लिए सबूतों की ज़रूरत होती है और इनका सही निपटारा सिविल कोर्ट में ही हो सकता है, न कि रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) में।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल जज बेंच एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका चास (Chas) के सब-डिविजनल ऑफिसर द्वारा 10 अप्रैल 2012 को जारी उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई, जिसमें एक प्राइवेट प्रतिवादी (respondent) के पक्ष में कुछ ज़मीन का कब्ज़ा वापस दिलाने के लिए फोर्स तैनात करने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ता का दावा था कि उसके पिता ने 1979 में रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख) के ज़रिए आठ डेसिमल ज़मीन खरीदी थी, अपने नाम पर म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) करवाया और उसके बाद से शांतिपूर्ण ढंग से उस पर कब्ज़ा बनाए रखा। याचिकाकर्ता के अनुसार, बाद में उसे पता चला कि सब-डिविजनल ऑफिसर ने एक जांच रिपोर्ट के आधार पर प्रतिवादी नंबर 5 को ज़मीन का कब्ज़ा सौंपने के लिए पुलिस तैनाती का निर्देश दिया, जिसके बाद उसे ज़बरदस्ती कब्ज़े से बेदखल कर दिया गया।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि विवादित आदेश केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जारी किया गया। सरकार ने कोर्ट को बताया कि अन्य बेंच के पहले के निर्देश के बाद डिप्टी कमिश्नर ने जांच की थी। जांच में पता चला कि प्रतिवादी नंबर 5 ने रजिस्टर्ड सेल डीड के ज़रिए ज़मीन खरीदी थी, संपत्ति की आधिकारिक पैमाइश (measurement) के लिए आवेदन किया और वही ज़मीन पर कब्ज़े में पाया गया। यह भी बताया गया कि रिट याचिका लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादी नंबर 5 ने संपत्ति प्रतिवादी नंबर 6 को ट्रांसफर की, जिसके पक्ष में म्यूटेशन भी हो गया।
हाईकोर्ट ने गौर किया कि प्रतिवादी नंबर 5 ने पुलिस से संपर्क करके आरोप लगाया कि कुछ लोग उसकी ज़मीन पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके बाद सब-डिविजनल ऑफिसर ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए विवादित आदेश जारी किया। कोर्ट ने यह भी देखा कि रिट याचिका में यह स्पष्ट रूप से कहने के बावजूद कि कार्यवाही के दौरान संबंधित सेल डीड पेश की जाएंगी, याचिकाकर्ता उन्हें रिकॉर्ड पर लाने में विफल रहा। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा खरीदी गई बताई जा रही ज़मीन की सीमाओं का भी खुलासा नहीं किया गया।
बेंच ने कहा कि ज़मीन पर कब्ज़े (एनक्रोचमेंट) के आरोपों वाले मामलों में किसी सहमति वाले नक्शे या सही सीमांकन (डिमारकेशन) के बिना फ़ैसला नहीं किया जा सकता। जहां प्रतिवादी नंबर 5 ने सर्कल ऑफ़िसर के ज़रिए ज़मीन की आधिकारिक पैमाइश करवाई, वहीं याचिकाकर्ता ने अपनी ज़मीन की पहचान के लिए कभी भी सक्षम अधिकारी से संपर्क नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ ज़ुबानी दावों के आधार पर कब्ज़े के बारे में कोई नतीजा नहीं निकाला जा सकता और तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों के कारण रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर ऐसे विवादित तथ्य सामने आते हैं तो इस सवाल का जवाब "साफ़ तौर पर नहीं" है कि क्या अनुच्छेद 226 के तहत उन पर फ़ैसला किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्यकारी कार्यों की न्यायिक समीक्षा सीमित है। जब तक सत्ता का दुरुपयोग, बाहरी विचार या साफ़ तौर पर गैर-कानूनी काम साबित न हो जाए, तब तक कोर्ट को प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कानून-व्यवस्था से जुड़े कार्यों के दौरान लिए गए फ़ैसलों में दखल नहीं देना चाहिए।
सब-डिविज़नल ऑफ़िसर के आदेश में कोई गैर-कानूनी बात न पाते हुए और यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता पूरी जानकारी के साथ कोर्ट में नहीं आया, हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।
Case Title: Md. Shahid Raja v. State of Jharkhand and Ors.
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
राष्ट्रीय सभा विशेष प्रतिनिधियों का पहला सम्मेलन शुरू, 17 मसौदा कानूनों पर चर्चा

डिजिटल कानून दौड़: QUATEST 3 में 19 सवालों का कानूनी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने कहा: समान पद पर वरिष्ठ को जूनियर से कम वेतन नहीं मिल सकता

पौध किस्म अधिकारों का प्रबंधन विज्ञान‑प्रौद्योगिकी मंत्रालय को सौंपा, बौद्धिक संपदा कानून में व्यापक संशोधन

ECI ने SIR के बावजूद चुनावी नतीजों पर असर नहीं मानते, TMC का ताजा चुनाव का याचिका खारिज

इलेक्शन कमिशन के निर्णय‑निर्धारण में असहमति और बहुमत का संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के बायोजो इम्मैन्युअल फैसले को आधार बनाते हुए वंदे मातरम् संशोधन को संवैधानिक चुनौती दी

ईसी के बयान से स्पष्ट: भाजपा और चुनाव आयोग का एकमत निर्णय, SIR पर विवाद खत्म
ताज़ा ख़बरें
- राष्ट्रीय सभा के विशेषज्ञ प्रतिनिधि करेंगे 17 मसौदा कानूनों पर विस्तृत चर्चा
- कर्नाटक व पश्चिम बंगाल में चुनावी रोल से हटाए गए लाखों मतदाता: समीक्षा प्रक्रिया में देरी और अपील लंबित
- चुनाव आयोग में आंतरिक असहमति और नियुक्ति नियमों पर संवैधानिक चुनौती
- जब रेफ़री भी गलती करे: चुनाव आयोग विवाद को समझाया 7 मुख्य प्रश्नों में
- सुप्रीम कोर्ट ने एआईएफ युद्ध विधवा को पुनः सेवा में लौटाया
- बैंकिंग क्षेत्र के तीन नए कानूनों के कार्यान्वयन हेतु विस्तृत योजना जारी
- प्रधानमंत्री ने पेट्रोलियम कानून के कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय योजना जारी की
- सुप्रीम कोर्ट ने ऑबसी क्रिमी लेयर निर्णय के भविष्य के प्रयोग पर जजमेंट रोक रखा

