चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामले में केंद्र सरकार ने कहा कि याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 324 की व्याख्या और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने की संसद की विधायी शक्ति के दायरे से जुड़े अहम सवाल उठाए गए हैं।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
चुनाव आयुक्तों से जुड़े कानून को चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बेंच को मामला भेजने पर आदेश सुरक्षित रखा
Shahadat
30 July 2026 5:16 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस शुरुआती मुद्दे पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया कि क्या 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को एक बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया।
केंद्र ने कोर्ट से मामले को संविधान बेंच के पास भेजने का आग्रह किया। केंद्र का तर्क था कि इन याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 324 की व्याख्या और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने की संसद की विधायी शक्ति के दायरे से जुड़े अहम सवाल उठाए गए।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में संविधान बेंच का फैसला - जिसमें निर्देश दिया गया कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) वाली समिति द्वारा की जाए - खुद ऐसे संवैधानिक मुद्दों को जन्म देता है, जिन पर बड़ी बेंच द्वारा आधिकारिक निर्णय की आवश्यकता है।
अटॉर्नी जनरल ने 'अनूप बरनवाल' फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अगर याचिकाकर्ताओं का यह तर्क है कि उस फैसले ने इस क्षेत्र को पूरी तरह से कवर कर लिया है तो संसद के पास इस मुद्दे पर कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं रह जाएगा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी मामले को बड़ी बेंच को भेजने पर जोर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि 'अनूप बरनवाल' फैसले में केवल एक अंतरिम व्यवस्था बताई गई और कोई ऐसी बाध्यकारी संवैधानिक आवश्यकता नहीं तय की गई थी कि चयन समिति में चीफ जस्टिस का शामिल होना अनिवार्य हो।
उनके अनुसार, याचिकाओं में कई अहम संवैधानिक सवाल उठाए गए, जैसे: क्या अनुच्छेद 324 के तहत संसद के कानून को सिर्फ इसलिए अमान्य किया जा सकता है, क्योंकि इसमें चयन समिति में चीफ जस्टिस जैसे किसी "बाहरी व्यक्ति" को शामिल नहीं किया गया? क्या संसद की विधायी शक्ति पर संविधान की अंतर्निहित सीमाएं लागू होती हैं? और क्या कानून की समीक्षा करते समय अदालतें संवैधानिक अधिकारियों द्वारा दुर्भावना या सत्ता के दुरुपयोग का अनुमान लगा सकती हैं?
उन्होंने तर्क दिया कि कोई संवैधानिक अदालत इस धारणा के साथ शुरुआत नहीं कर सकती कि प्रधानमंत्री या कार्यपालिका लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ काम करेंगे।
Case Title - Dr. Jaya Thakur v. Union of India and connected cases
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