रेलवे को बड़ा झटका, अवैध कब्जे को हटाने के लिए पूर्ण कानूनी प्रक्रिया अनिवार्य
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि रेलवे कानूनी मंजूरी के बिना गैर-कानूनी कब्जे वालों को नहीं हटा सकता है। अदालत ने कहा कि अचल संपत्ति से जबरदस्ती बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है, और कानून ने यह अनिवार्य किया है कि कब्जेदार को भी उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना संपत्ति से नहीं हटाया जा सकता।

सौजन्य से:- ETV Bharat
उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा निर्णय, अवैध कब्जे को बिना कानूनी मंजूरी के नहीं हटा सकता रेलवे
नैनीताल हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि रेलवे कानूनी मंजूरी के बिना रेलवे जमीन पर अवैध कब्जा नहीं हटा सकता है.
By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : June 27, 2026 at 1:17 PM IST
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक मामले पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि, रेलवे कानून की उचित प्रक्रिया का अनुपालन किए बगैर सामान्य नोटिस से अनधिकृत कब्जा करने वालों को नहीं हटाया जा सकता है.
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि, रेलवे की जमीन पर गैर-कानूनी कब्जा करने वाले व्यक्ति को भी कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना सामान्य प्रशासनिक नोटिस के आधार पर नहीं हटाया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि, कानूनी प्रकिया अपनाए बिना किसी संपत्ति से जबरदस्ती बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है, और बेदखली केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का अनुपालन करके ही की जा सकती है. वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने यह आदेश दिया.
मामले के अनुसार, याचिका में सीनियर सेक्शन इंजीनियर (वर्क्स), नॉर्दर्न रेलवे, देहरादून द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं ने मसूरी के झड़ीपानी में स्थित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक का दावा किया. विवादित नोटिस में रेलवे की जमीन पर कथित तौर पर कब्जा करने वाले लोगों को जमीन खाली करने का नोटिस दिया गया. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नोटिस उनके घरों पर लगाया गया और उनसे उक्त भूमि को निर्धारित समय के भीतर खाली करने को कहा है. जबकि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया है.
कोर्ट ने कहा कि,
'कानूनी मंजूरी के बिना किसी व्यक्ति को अचल संपत्ति से बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों, दोनों का उल्लंघन और प्राप्त अधिकारों का हनन है. भले ही वह गैर-कानूनी कब्जा ही क्यों न हो. संपत्ति के मालिक द्वारा कानून को अपने हाथ में लेकर उन्हें जबरन नहीं हटाया जा सकता'.
कोर्ट ने कहा कि, स्थापित कब्जे से बेदखली केवल अदालत के आदेश के बाद ही की जा सकती है और कानून की उचित प्रक्रिया का पालन तभी माना जाता है, जब सक्षम अदालत द्वारा पक्षों को सुना हो और सही गलत का अवलोकन किया हो और फिर बेदखली का फैसला दिया हो.
कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि,
'कानूनी मंजूरी के बिना किसी व्यक्ति को अचल संपत्ति से जबरदस्ती बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों, दोनों का उल्लंघन है. कानून यह अनिवार्य करता है कि स्थापित कब्जे वाले किसी घुसपैठिए या किराएदार को भी जबरदस्ती नहीं हटाया जा सकता. जमीन के मालिक को सक्षम अदालत से आदेश प्राप्त करना होगा और स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा'.
कोर्ट ने पाया कि, विवादित नोटिस किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी नहीं किया गया और दोहराया कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना गैर-कानूनी कब्जा करने वाले व्यक्ति को भी संपत्ति से नहीं हटाया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि, याचिकाकर्ताओं को तीस दिनों के भीतर जमीन खाली करने का निर्देश देने वाला प्रशासनिक नोटिस कानून की नजर में मान्य नहीं हो सकता.
कोर्ट ने रेलवे के द्वारा दिए गए 5.10.2023 के नोटिस को निरस्त करते हुए यह स्पष्ट किया कि रेलवे गैर-कानूनी कब्जे में पाए गए लोगों के खिलाफ कानून का अनुपालन करते हुए उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा.
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