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सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की सोशल मीडिया सुरक्षा पर केंद्र सरकार को जवाब देने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका के सिलसिले में MeitY और कानून मंत्रालय को नोटिस जारी कर 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों की सोशल मीडिया उपयोग पर कानूनी सुरक्षा की मांग को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने सभी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को यह निर्देश देने की मांग की है कि नाबालिगों के साथ किए गए अनुबंध शून्य माने जाएँ और आयु‑पुष्टि एवं अभिभावक संरक्षण के उपाय तुरंत लागू हों।

10 सितंबर 2026 को 05:05 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की सोशल मीडिया सुरक्षा पर केंद्र सरकार को जवाब देने को कहा

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार (MeitY और कानून मंत्रालय) को नोटिस जारी किया है

नई दिल्ली: सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नाबालिगों की पहुंच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि भारत में बच्चों के लिए कुछ सुरक्षा उपाय होने जरूरी हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून एवं न्याय मंत्रालय से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के दौरान कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा देने की मांग की गई है।

NGO ने SC से की ये मांग

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने एक NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की याचिका पर दोनों मंत्रालयों को नोटिस जारी किया। NGO की ओर से सीनियर एडवोकेट एच.एस. फूलका ने पक्ष रखा। याचिका में केंद्र को निर्देश देने की मांग की गई है कि सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया इंटरमीडियरी को यह स्पष्ट रूप से बताया जाए कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ किया गया कोई भी करार शुरू से ही अमान्य (void ab-initio) होगा। ऐसे करार के आधार पर उठाए गए किसी भी कदम को तत्काल रोकने की भी मांग की गई है।

कानूनी रूप से अनुबंध करने में सक्षम नहीं

याचिकाकर्ता का कहना है कि भारतीय कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 11 के तहत नाबालिग कानूनी रूप से अनुबंध करने में सक्षम नहीं है। इसके बावजूद बच्चे स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बना और संचालित कर रहे हैं। याचिका में इसे बच्चों की कानूनी स्थिति और उनके मौलिक अधिकारों के बीच गंभीर अंतर बताया गया है।

बच्चों के मौलिक अधिकारों पर गंभीर खतरा

याचिका में कहा गया है कि बच्चों को बिना प्रभावी और समान आयु-पुष्टि (age assurance) तथा गार्जियन सुरक्षा के डेटा आधारित डिजिटल सिस्टम के हवाले करना केवल नियामकीय कमी का मामला नहीं है। इससे बच्चों के जीवन, गरिमा, निजता, सुरक्षा, स्वस्थ विकास और समग्र कल्याण से जुड़े मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। याचिका के मुताबिक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अनियंत्रित पहुंच से बच्चों के ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, मानव तस्करी, व्यवहार में हेरफेर, प्रोफाइलिंग, निजी डेटा के दुरुपयोग, साइबर बुलिंग और उम्र के अनुपयुक्त सामग्री के संपर्क में आने का खतरा है।

13 साल की उम्र में अकाउंट, लेकिन...

याचिका में खास तौर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और स्नैपचैट का उदाहरण दिया गया है। इसके मुताबिक इन प्लेटफॉर्म पर भारत में 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने की अनुमति है, जबकि भारतीय कानून के तहत 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति नाबालिग है। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि जब भारतीय कानून नाबालिग को अनुबंध करने में सक्षम नहीं मानता, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म उन्हें स्वतंत्र रूप से अकाउंट खोलने और ऐसी सेवाओं का इस्तेमाल करने की अनुमति कैसे दे सकते हैं।

CSAM रोकने के लिए भी प्रभावी सिस्टम की मांग

याचिका में बच्चों से संबंधित यौन शोषण सामग्री (Child Sexual Exploitative and Abuse Material) के प्रसार और उसे स्टोर करने पर मौजूद कड़े आपराधिक प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद इंटरनेट प्लेटफॉर्म ने ऑटोमेटेड कंटेंट-फिल्टरिंग और प्रभावी उम्र सत्यापन व्यवस्था पर्याप्त रूप से लागू नहीं की है। याचिका में कहा गया है कि डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा जा सकता। प्लेटफॉर्म को पहले से ऐसे सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे, जिससे बच्चों को खतरनाक और उम्र के अनुरूप न होने वाली सामग्री से बचाया जा सके।

e-KYC व्यवस्था लागू करने की मांग

PIL में Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 में संशोधन करने या बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए अलग दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। याचिका के अनुसार 18 साल से कम उम्र के किसी बच्चे को डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने की अनुमति तभी दी जानी चाहिए, जब उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति हो। इसके लिए अभिभावक की पहचान और अधिकार की e-KYC/पहचान सत्यापन व्यवस्था भी होनी चाहिए।

सेवा के जोखिम के मुताबिक अभिभावकीय निगरानी

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि जहां किसी नाबालिग को डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने की अनुमति हो, वहां उसकी पहुंच कानूनी रूप से मान्य गार्जियनशिप या वैध संरक्षक की भागीदारी वाली व्यवस्था के अधीन हो। यह व्यवस्था संबंधित डिजिटल सेवा की प्रकृति और उससे जुड़े जोखिम के अनुरूप होनी चाहिए।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें

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