यूपी में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का कानूनी संकट: हाईकोर्ट ने सवाल उठाए
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सवाल उठाए हैं, जिससे राज्य सरकार से जवाब मांगे गए हैं। कोर्ट ने कहा कि इसमें उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) की संवैधानिक वैधता की जांच की आवश्यकता है।

सौजन्य से:- ABP News
यूपी में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल, राज्य सरकार से जवाब तलब
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने पर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने राज्य सरकार से इस पर जवाब मांगा है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के फैसले पर संवैधानिक सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने कहा कि इसमें उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) की संवैधानिक वैधता की जांच की आवश्यकता है.
पीठ ने राज्य सरकार का पक्ष समझने के लिए पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को 10 जुलाई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने का निर्देश दिया. न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने संजय कुमार शर्मा की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं.
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर सवाल
पीठ ने कहा कि प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2000) मामले में एक समन्वय पीठ ने इसी तरह के वैधानिक प्रावधान को रद्द कर दिया था. अदालत ने उस समय माना था कि यह संविधान के अनुच्छेद ‘243-E’ और ‘243-K’ के तहत पंचायतों के कार्यकाल और राज्य निर्वाचन आयोग की शक्तियों को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में दायर अपील का निपटारा करते हुए कानून से जुड़े सवालों को उचित मामले में विचार के लिए खुला छोड़ दिया था. उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठता है कि क्या निवर्तमान ग्राम प्रधान को प्रशासक नियुक्त करने से निर्वाचित पंचायत का कार्यकाल संवैधानिक रूप से निर्धारित अवधि से आगे प्रभावी रूप से बढ़ जाता है.
अदालत ने साथ ही यह भी सवाल किया कि क्या ऐसी व्यवस्था पंचायत चुनाव समय पर कराने के राज्य निर्वाचन आयोग के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है.
कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
पीठ ने इन मुद्दों के महत्व को देखते हुए निर्देश दिया कि मामले को इसी तरह के सवालों से संबंधित अन्य लंबित जनहित याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया जाए. अदालत ने राज्य सरकार से निर्वाचित निकाय का कार्यकाल समाप्त होने के बाद पूर्व ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बनाए रखने के कानूनी आधार और संवैधानिक औचित्य को स्पष्ट करने को भी कहा.
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