क्या शादीशुदा महिला या पुरुष Live-In Relationship में रह सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्या कहते हैं?
लिव इन रिलेशनशिप क्या होता है स्वतंत्र जीवन का विकल्प या जोखिम भरा फैसला? सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से समझिए अपने अधिकार दो बालिगों का साथ रहना अपने आप में अपराध नहीं पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में माना है कि दो बा…

सौजन्य से:- Navbharat Times
लिव इन रिलेशनशिप क्या होता है स्वतंत्र जीवन का विकल्प या जोखिम भरा फैसला? सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से समझिए अपने अधिकार
दो बालिगों का साथ रहना अपने आप में अपराध नहीं
पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में माना है कि दो बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से साथ रहने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। केवल इस आधार पर कि दो वयस्क विवाह के बिना साथ रह रहे हैं, उनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर लिव-इन संबंध को कानून की नजर में विवाह के बराबर माना जाएगा। खासकर तब, जब दोनों में से कोई एक व्यक्ति पहले से विवाहित हो।पहले से शादीशुदा व्यक्ति के साथ लिव-इन पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
- इंद्रा सरमा बनाम वी.के.वी. शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस अंतर को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। इसमें अदालत ने उस स्थिति पर विचार किया जिसमें पुरुष पहले से विवाहित था और एक महिला उसके साथ संबंध में रह रही थी।
- कोर्ट ने कहा कि हर लिव-इन संबंध को 'विवाह की प्रकृति वाला संबंध' नहीं माना जा सकता। घरेलू हिंसा कानून के तहत संरक्षण पाने के लिए संबंध की वास्तविक प्रकृति और परिस्थितियों को देखना जरूरी है।
- यदि महिला को पहले से पता था कि पुरुष किसी अन्य महिला से विवाहित है और उसकी पहली शादी कायम है, तो ऐसे संबंध को विवाह की प्रकृति वाला संबंध मानने में महत्वपूर्ण कानूनी बाधाएं हो सकती हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप को 'विवाह के समान' आंकने के लिए कुछ प्रमुख दिशा-निर्देश और मानदंड तय किए थे: जिनमें संबंधों की अवधि , साझा घरेलू गृहस्थी , साझा वित्तीय सहयोग, साझा घरेलू व्यवस्था, साझी सार्वजनिक छवि और साथी की वैवाहिक स्थिति की जानकारी जैसे फैक्टर खास हैं।
विवाह पर कानूनी असर हो सकता है
दरअसल, ऐसे मामलों में केवल व्यभिचार के आधार पर अब आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले में 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का अर्थ यह नहीं है कि उसके सभी वैवाहिक प्रभाव भी समाप्त हो गए हैं। विवाह संबंधी कानूनों के तहत व्यभिचार कुछ परिस्थितियों में तलाक का आधार बन सकता है। इसलिए आपराधिक कानून और वैवाहिक कानून को अलग-अलग समझना जरूरी है। यानी किसी व्यक्ति को व्यभिचार के लिए जेल न हो, लेकिन उसके विवाह से जुड़े विवाद में उसी आचरण का कानूनी महत्व हो सकता है।क्या शादीशुदा व्यक्ति के साथ रहने वाले साथी को घरेलू हिंसा कानून का संरक्षण मिलेगा?
इसका उत्तर न तो पूरी तरह हां है, और न ही पूरी तरह ना। हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम में ‘विवाह की प्रकृति वाले संबंध’ को भी मान्यता दी गई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हर लिव-इन संबंध इस श्रेणी में नहीं आता। अदालत संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का साथ रहना, साझा घर, आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक रूप से पति-पत्नी की तरह रहना और अन्य परिस्थितियों को देख सकती है।Live-in Relationship भी हो शादी जैसी, तो महिला उत्पीड़न पर IPC 498A वाली सजा-सुप्रीम कोर्ट, जानिए इसके बारे में सब कुछ
क्या शादीशुदा महिला भी किसी दूसरे पुरुष के साथ रह सकती है?
गौर करने वाली बात है कि व्यभिचार को अपराध से बाहर करने के बाद इस मामले में महिला और पुरुष के लिए मूल आपराधिक स्थिति समान है। जोसेफ शाइन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुराने व्यभिचार कानून को लैंगिक भेदभाव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर असंवैधानिक माना। इसलिए आज केवल इस आधार पर कि कोई शादीशुदा महिला किसी दूसरे वयस्क पुरुष के साथ संबंध में है, उसके खिलाफ व्यभिचार का आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। लेकिन ऐसे संबंधों के अन्य वैवाहिक या दीवानी परिणाम अलग कानूनों के तहत तय हो सकते हैं।'मां-बाप की इज्जत खराब होती है' घर से भाग कर Live-in Relationhship मामले में बोला हाईकोर्ट
लिव-इन में रहना और दूसरी शादी करना एक बात नहीं
दरअसल, यही सबसे महत्वपूर्ण कानूनी फैक्टर है। दोनों वयस्कों का साथ रहना और दूसरी कानूनी शादी करना अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति की पहली शादी कायम रहते हुए दूसरी शादी करने पर अलग कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं। इसलिए व्यभिचार अपराध नहीं है का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति पहली शादी खत्म किए बिना दूसरी वैध शादी कर सकता है। इसी तरह, किसी शादीशुदा व्यक्ति का दूसरे वयस्क के साथ रहना अपने आप उस दूसरे व्यक्ति को उसकी कानूनी पत्नी या पति नहीं बना देता।70 साल की पत्नी, 72 साल का पति, दोनों ने लिया तलाक, जानें क्या थी मजबूरी कि हाई कोर्ट ने दे दी मंजूरी
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
पूर्णकालिक राष्ट्रीय सभा प्रतिनिधियों ने प्रशासनिक‑न्यायिक मसौदा कानूनों पर चर्चा की

सुप्रीम कोर्ट ने तय किया, ट्रैफ़िक जुर्माने बिजली बिल से जोड़े जाएंगे

कैलकत्ता हाई कोर्ट ने कांग्रेस के नंदीग्राम उम्मीदवार मिलन प्रधान को 21 अक्टूबर तक अंतरिम जमानत दी

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना, मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर 10 लाख की लागत तय, एनएसए हिरासत को कहा 'क़ानूनी नहीं'

दिल्ली हाई कोर्ट में व्यक्तित्व अधिकार की परिभाषा पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने NSA से मल्ला अफ़रोज़ की रोकथाम को रद्द किया, यूपी सरकार पर ₹10 लाख जुर्माना लगाया

सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती, मनीषा मौत मामले में अधिवक्ता ने जवाब दाखिल; अगली सुनवाई 14 अक्टूबर
ताज़ा ख़बरें
- सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय में शामिल करने की सिफ़ारिश की
- सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को पैक्ड फूड चेतावनी लेबल के 365‑दिन की स्वैच्छिक अवधि पर सवाल किया
- सिंगापुर की अदालत ने भारतीय आईटी वेंडर को 7 महीने की जेल, 18,000 संवेदनशील फाइलों की अनधिकृत पहुँच के आरोप
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने FSSAI से सवाल: रिड बुल पर 'एनर्जी ड्रिंक' वर्जन से पहले क्या नोटिस दिया गया?
- सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के सोशल‑मीडिया उपयोग पर केंद्र को वैधानिक सुरक्षा व्यवस्था बनाने का आदेश
- सुप्रीम कोर्ट ने शिवार सैना के कॉर्पोरेटर रामेश माथरे का बAIL निरस्त किया, डॉक्टरों पर हमला को रोकने के लिए मजबूत सन्देश
- एनआईए की विशेष अदालत ने 'वॉइस ऑफ़ हिंद' साजिश में ISIS के चार सदस्यों को सजा दी
- लखनऊ खंडपीठ से 25 साल बाद दूसरा जज: न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित

