सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद उत्तराखंड के शहरों में फुटपाथ खोजना एक संघर्ष!
सुप्रीम कोर्ट ने हाल में फुटपाथ पर चलने को नागरिकों का मौलिक अधिकार बताया है, लेकिन उत्तराखंड के शहरों में शहर विकास के बावजूद फुटपाथ व्यवस्था की समस्याएं जारी हैं।

सौजन्य से:- Jagran
पैदल यात्रियों की मुश्किल: SC ने बताया 'मौलिक अधिकार', पर IIT रुड़की की स्टडी में खुली फुटपाथों की पोल
सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने को नागरिकों का मौलिक अधिकार बताया है, लेकिन उत्तराखंड के शहरों में स्थिति चिंताजनक है। ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने को मौलिक अधिकार बताया
- उत्तराखंड के शहरों में फुटपाथ टूटे और अतिक्रमण से ग्रस्त
- आईआईटी रुड़की अध्ययन ने पैदल यात्रियों की समस्याओं को उजागर किया
राज्य ब्यूरो, देहरादून। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में स्पष्ट किया कि फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। नगर निकायों की जिम्मेदारी है कि वे पैदल यात्रियों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराएं।
अदालत की टिप्पणी के बीच उत्तराखंड की स्थिति कई सवाल खड़े करती है। राज्य में शहरों का विस्तार हो रहा है। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी और रुड़की जैसे शहरों में आबादी व वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
सड़क चौड़ीकरण, फ्लाईओवर और अन्य आधारभूत ढांचे पर काम हो रहा है, लेकिन इस विकास के बीच पैदल चलने वाला व्यक्ति कहां खड़ा है, यह सवाल पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
हाल में भारतीय शहरों में फुटपाथ व्यवस्था को लेकर पैदल यात्रियों की जरूरतों और प्राथमिकताओं पर अध्ययन किया गया।
सेंटर फार ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम्स तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) रुड़की से जुड़े शोधकर्ताओं रवि कांत, शुभजीत और रमेश अंबानंदम ने यह अध्ययन किया।
इसमें उत्तराखंड के शहरों को शामिल किया गया। इस अध्ययन में 1,372 लोगों की राय लेकर पैदल यात्रियों से जुड़े 27 पहलुओं को समझने का प्रयास किया गया। नतीजों से स्पष्ट हुआ कि समस्या केवल फुटपाथ की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी बड़ा मुद्दा है।
आमजन ने बताया कि कई स्थानों पर फुटपाथ टूटे हुए हैं, उनकी सतह ऊबड़-खाबड़ है और कई जगह वे अचानक समाप्त हो जाते हैं। यानी व्यक्ति कुछ दूरी तक फुटपाथ पर चलता है और फिर अचानक सड़क के बीच खुद को पाता है।
अध्ययन में बैठने की व्यवस्था की कमी, सार्वजनिक शौचालयों के अभाव और दिव्यांगजन सुविधाओं की कमी को भी प्रमुख समस्याओं में शामिल किया गया। कई स्थानों पर रैंप और दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए संकेतक टाइल्स भी नहीं हैं।
चुनौती केवल फुटपाथ निर्माण की नहीं
चुनौती केवल फुटपाथ निर्माण तक सीमित नहीं हैं। अतिक्रमण, अस्थायी दुकानें, अवैध पार्किंग और निर्माण सामग्री का कब्जा भी बड़ी बाधा बन रहा है।
पहाड़ी क्षेत्रों में सीमित स्थान, संकरी सड़कें और ढलानदार भूभाग स्थिति को और कठिन बनाते हैं। बरसात में मलबा और जलभराव समस्या बढ़ा देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकार स्पष्ट कर दिया है, लेकिन सवाल अब भी यही है कि शहर पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ बनाएंगे, उन्हें अतिक्रमण से मुक्त करेंगे या लोग पहले फुटपाथ खोजने की चुनौती से जूझते रहेंगे।
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