सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना विवाद: उद्धव गुट का चुनाव आयोग पर हमला
शिवसेना के विधायक दल में टूटे हुए उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वे चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दे रहे हैं जिसमें अपने गुट को असली शिवसेना नहीं माना गया है। उद्धव गुट की याचिका पर कोर्ट ने आगे की सुनवाई के लिए बुधवार की तिथि तय की है।

सौजन्य से:- Jagran
'विधायक दल में बंटवारा राजनीतिक दल में टूट नहीं', सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट ने चुनाव आयोग को घेरा
सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना विवाद पर सुनवाई के दौरान उद्धव गुट ने तर्क दिया कि विधायक दल में टूट राजनीतिक दल में टूट के बराबर नहीं है। ...और पढ़ें
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति के पुराने और गहरे जख्मों पर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे - यूबीटी) गुट ने शीर्ष अदालत में जोरदार पैरवी करते हुए कहा है कि केवल विधायक दल में टूट होना कभी भी राजनीतिक दल में टूट के बराबर नहीं हो सकता।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई के तीसरे दिन मंगलवार को उद्धव गुट की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के उस फैसले को पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को 'असली शिवसेना' की मान्यता दी गई थी और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह सौंपा गया था।
चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने केवल विधायक दल में हुए विभाजन के आधार पर पूरे राजनीतिक दल में टूट का गलत निष्कर्ष निकाला है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह धारणा न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि रद किए जाने योग्य भी है। सिब्बल ने कहा कि जिन लोगों ने 2018 के पार्टी संविधान को अलोकतांत्रिक बताया, वे खुद उसी संविधान के तहत पदों और लाभों पर आसीन रहे हैं।
इसलिए वे बाद में इस दस्तावेज को चुनौती नहीं दे सकते। साथ ही, उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चुनाव आयोग के पास जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत किसी पंजीकृत राजनीतिक दल के आंतरिक संविधान को अलोकतांत्रिक कहकर खारिज करने का कोई अधिकार नहीं है।
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संविधान और लोकतंत्र के मौलिक अधिकारों का हवाला
सिब्बल ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(सी) का हवाला देते हुए कहा कि एक राजनीतिक दल स्वैच्छिक संगठन है, जिसे अपने ही नियमों के अनुसार काम करने का पूरा अधिकार है। हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि 'लोक व्यवस्था' और 'नैतिकता' जैसे शब्द काफी व्यापक और लचीले हैं, जिस पर संवैधानिक नैतिकता का सवाल भी खड़ा होता है।
उद्धव गुट का लगातार यह पक्ष रहा है कि चुनाव आयोग ने असली शिवसेना तय करते समय सांगठनिक समर्थन की बजाय विधायी ताकत को प्राथमिकता देकर भारी भूल की है। इस अहम मामले पर कोर्ट में बुधवार को आगे की सुनवाई जारी रहेगी।
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