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500 रुपये की घड़ी के विवाद में 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, दोषी को मिली सजा

सुप्रीम कोर्ट ने 29 साल बाद एक मामले का फैसला सुनाते हुए दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा घटा दी है, जिसने एक 500 रुपये की घड़ी के विवाद में एक व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई थी।

26 जून 2026 को 03:24 pm बजे
500 रुपये की घड़ी के विवाद में 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, दोषी को मिली सजा

सौजन्य से:- Amar Ujala

Supreme Court: 500 रुपये की घड़ी बनी थी युवक के मौत की वजह, 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया आजाद

करीब तीन दशक पहले घड़ी को लेकर हुए विवाद में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस मामले में करीब 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए जीवित बचे आरोपी की पांच साल की सजा घटाकर उसे पहले से काटी गई डेढ़ साल की सजा के बराबर मान लिया और मामले का निपटारा कर दिया।

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विस्तार

साल 1997 में 500 रुपये की एक घड़ी को लेकर शुरू हुआ पड़ोसियों का मामूली विवाद आखिरकार एक व्यक्ति की मौत का कारण बन गया। इस मामले में करीब तीन दशक बाद सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाते हुए लंबे समय से चली आ रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के तहत दोषी ठहराए गए तीन लोगों के मामले का निपटारा करते हुए कहा कि दोषसिद्धि तो बरकरार रहेगी, लेकिन अब जीवित बचे एक आरोपी को उतनी ही सजा मान ली जाएगी, जितनी वह पहले ही काट चुका है।

क्या था मामला?

मामले के अनुसार, पदम सिंह ने अपने पड़ोसी महुआ को 500 रुपये में एक घड़ी बेची थी। लेकिन महुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और वह उसे लौटाने पहुंचा। इसी बात पर दोनों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जो देखते ही देखते हाथापाई में बदल गई। इस दौरान महुआ के साथ रामू और मथु भी आ गए। तीनों ने मिलकर पदम सिंह पर हमला कर दिया। झगड़े के दौरान तीनों ने पदम सिंह को सूखी नहर में धक्का दे दिया गया। आरोप था कि झगड़े के दौरान मथु ने पदम सिंह के सिर पर भारी पत्थर से भी वार किया। सिर पर चोट लगने की वजह से सिंह नहर की पथरीली सतह पर गिर गएन जिससे उन्हें गंभीर चोटें आ गईं। घटना के बाद पदम सिंह को इलाज के लिए दून अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी।

तीन में से दो आरोपियों की हो चुकी मौत

देहरादून की ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2002 में तीनों आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए पांच-पांच साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। बाद में 2012 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को सही माना। इसके बाद आरोपियों ने उसी साल सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि अपील लंबित रहने के दौरान तीन दोषियों में से दो की मौत हो चुकी है। तीसरे आरोपी मथु की उम्र अब 60 वर्ष से अधिक हो चुकी है और वह पहले ही करीब डेढ़ साल जेल में बिता चुका है।

ये भी पढ़ें: कोर्ट में पेशी के बाद जेल भेजे गए आरोपी; 79 लाख बरामद, पांच से छह SBI कर्मी भी शामिल

'पांच साल की सजा पूरी करवाना उचित नहीं'

बेंच ने कहा कि घटना को लगभग 29 साल बीत चुके हैं। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि मृतक के चेहरे और सिर पर जो चोटें थीं, वे सूखी नहर की पथरीली सतह पर गिरने से भी लगी थीं। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय बाद पांच साल की सजा पूरी करवाना उचित नहीं होगा। इसलिए मथु की सजा को घटाकर उतनी ही अवधि माना जाता है, जितनी वह पहले ही जेल में काट चुका है। हालांकि, उसकी दोषसिद्धि बरकरार रहेगी। इस तरह 500 रुपये की एक घड़ी से शुरू हुआ विवाद, जिसने एक व्यक्ति की जान ले ली थी, करीब तीन दशक बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच गया।

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