सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा
सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री की अनिवार्य रिपोर्टिंग में कमी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस की याचिका पर यह फैसला आया है, जिसमें सोशल मीडिया मंचों पर अनिवार्य रिपोर्टिंग में कमी पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है।

सौजन्य से:- Jagran
सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर बाल यौन शोषण सामग्री की अनिवार्य रिपोर्टिंग में कमी को लेकर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण सामग्री पर केंद्र को नोटिस दिया।
- सोशल मीडिया मंचों पर अनिवार्य रिपोर्टिंग में कमी पर याचिका दायर।
- 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस' ने इंस्टाग्राम पर आरोप लगाए।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया मंचों द्वारा बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार संबंधी सामग्री की अनिवार्य रिपोर्टिंग को लेकर कोर्ट के जारी निर्देशों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने जस्ट राइट्स फार चिल्ड्रन एलायंस की याचिका पर केंद्रीय इलेक्ट्रानिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्ट राइस्टस फॉर चिल्ड्रन एलायंस संस्था ने इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों के मुद्दे पर यह याचिका दाखिल की है।
याचिका में संस्था ने सोशल मीडिया मंचों की ओर से सितंबर 2024 में आये सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन न करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि ये सी-सीम को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन दिखा रहे हैं। इससे सुप्रीम कोर्ट के मिडियेटरीज के कानूनी दायित्वों के पालन को लेकर पूर्व आदेश को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता संस्था को मिडियेटरीज को भी पक्षकार बनाने की अर्जी दाखिल करने की इजाजत दी है।
इसी संस्था की याचिका पर कोर्ट ने 2024 में दिए आदेश में कहा था कि सोशल मीडिया मंचों को सी-सीम से जुड़े मामलों का कानून लागू करने वाली एजेंसियों को जानकारी देने के अपने दायित्व का पालन करना होगा। इससे बाल यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पाक्सो) अधिनियम के तहत तय दायित्व भी शामिल हैं।
उस आदेश में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत सुरक्षित पनाह के संरक्षण के संदर्भ में मिडियेटरीज के दायित्वों पर भी विचार किया गया था। संस्था ने अपनी इस ताजा याचिका में इन दायित्वों को प्रभावी ढंग से लागू कराने और बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्रियों के ऑनलाइन प्रसार को रोकने के लिए एक व्यापक तंत्र बनाने की मांग की है।
याचिका में अन्य उपायों के अलावा सोशल मीडिया मंचों (मिडियेटरीज) के लिए इन सामग्रियों की पहचान और अनिवार्य रिपोर्टिंग, साक्ष्यों के संरक्षण तथा संबंधित एजेंसियों के समन्वय को लेकर एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार कर उसे अधिसूचित करने की मांग की है।
याचिका में अपराधियों के ब्योरे राष्ट्रीय यौन अपराधी डेटा बेस (एनडीएसओ) पर तुरंत अपलोड करने, किसी मिडियेटरीज से मिली हर रिपोर्ट पर कानून लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा समय से कार्रवाई सुनिश्चित करने और अनिवार्य रिपोर्टिंग संबंधी दायित्वों का पालन न करने वाले मिडियेटरीज के खिलाफ कानून के मुताबिक आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की भी मांग की गई है।
याचिका में मिडियेटरीज द्वारा सी-सीम की रिपोर्टिंग को आसान बनाने के लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल बनाने की भी मांग की गई है।
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