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सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज बनने के लिए तीन साल वकालत का अनुभव घटा कर एक साल किया - supreme court reduces civil judge experience to 1 year key changes news in hindi

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज बनने के लिए तीन साल वकालत का अनुभव घटा कर एक साल किया सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती के लिए वकालत के अनुभव की शर्त को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया है। HighLights - वकालत क…

21 अगस्त 2026 को 03:55 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज बनने के लिए तीन साल वकालत का अनुभव घटा कर एक साल किया
 - supreme court reduces civil judge experience to 1 year key changes news in hindi

सौजन्य से:- Jagran

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज बनने के लिए तीन साल वकालत का अनुभव घटा कर एक साल किया

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती के लिए वकालत के अनुभव की शर्त को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया है।

HighLights

- वकालत का अनुभव तीन साल से घटाकर एक साल किया गया।

- चयनित उम्मीदवारों को न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण और क्लर्कशिप करनी होगी।

- यह व्यवस्था पांच साल बाद समीक्षा के अधीन होगी।

माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इंट्री लेबल की न्यायिक परीक्षा यानी सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती के संबंध में महत्वपूर्ण फैसलॉ दिया है। कोर्ट ने अपने मई 2025 के फैसले में बदलॉव करते हुए कानून स्नातकों (लॉ ग्रेजुएट) के इंट्री लेबल की न्यायिक सेवा परीक्षाओं में शामिल होने के लिए जरूरी तीन साल के वकालत के अनुभव की शर्त को घटा कर एक साल कर दिया है।

हालॉंकि चयनित उम्मीदवारों को न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण और उसके बाद न्यायाधीशों के अधीन एक साल की क्लर्कशिप करनी होगी। ये फैसलॉ प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, एजी मसीह और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दो-एक के बहुमत से सुनाया है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और एजी मसीह ने बहुमत का फैसलॉ देते हुए यह व्यवस्था दी और अपने पूर्व के आदेश में बदलॉव किया जबकि जस्टिस चंद्रन ने बहुमत से असहमति जताने वालॉ फैसलॉ देते हुए मई 2025 का फैसलॉ बरकरार रखा है।

मई 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की परीक्षा में बैठने के लिए उम्मीदवार के पास कम से कम तीन साल का वकालत का अनुभव होना चाहिए। कई पुनर्विचार याचिकाओं और संशोधन अर्जियों के जरिये इस फैसले को चुनौती दी गई थी जिनका निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यह अहम फैसलॉ दिया।

फैसले में कोर्ट का जोर इस बात पर है कि न्यायिक सेवा में प्रवेश की प्रक्रिया में वकालत, प्रशिक्षण और वास्तविक न्यायिक अनुभव को महत्व देने पर है। चयनित उम्मीदवारों को स्वतंत्र रूप से न्यायिक जिम्मेदारी सौंपने से पहले उन्हें अदालत की कार्यप्रणाली, न्यायिक अनुशासन और व्यावहारिक निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त रूप से परिचित कराया जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कई निर्देश जारी किये हैं।

फैसले में कोर्ट ने एक श्रेणी को राहत भी दी है कोर्ट ने कहा है कि 25 मई 2025 और 31 मार्च 2027 के बीच घोषित न्यायिक परीक्षाओं में शामिल होने वाले उम्मीदवार बिना किसी वकालत के अनुभव के भी योग्य माने जाएंगे। चयनित होने पर ऐसे उम्मीदवारों को प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी नामित किया जाएगा और उन्हें संबंधित राज्य न्यायिक अकादमी में एक वर्ष का अनिवार्य गहन प्रशिक्षण लेना होगा।

इसके बाद उन्हें एक साल की स्ट्रक्चर्ड क्लर्कशिप भी पूरी करनी होगी। जिसमें पहले छह महीने जिलॉ एवं सत्र न्यायाधीश या उच्च न्यायिक सेवा के न्यायाधीशों के पर्यवेक्षण में लॉ क्लर्क के रूप में काम करेंगे और शेष छह महीने संबंधित हाई कोर्ट के किसी कार्यरत न्यायाधीश के पर्यवेक्षण में काम करेंगे।

लॉ क्लर्कशिप के दौरान प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी को राज्य न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान मिलने वाले समान पारिश्रमिक का भुगतान किया जाएगा। इसके अतिरिक्त कोई अन्य भत्ता आदि नहीं मिलेगा। लॉ क्लर्कशिप पूरी होने के बाद जिस हाई कोर्ट के न्यायाधीश के अधीन प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी ने काम किया होगा वो न्यायाधीश, प्रशिक्षु के प्रदर्शन और उपयुक्तता के संबंध में कारणयुक्त मूल्यांकन रिपोर्ट देगा।

यदि मूल्यांकन संतोषजनक पाया जाता है तो, उस प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी को नियमित पद पर नियुक्त किया जाएगा और उसके बाद उसे उस पद से जुड़े नियमित वेतनमान तथा अन्य सेवा लॉभ प्राप्त होंगे। कोर्ट ने फैसले में कहा कि बिना किसी ट्रांजीशनल इंतजाम के तीन साल वकालत के नियम को अचानक लॉगू करने से युवा वकीलों और लॉ ग्रेजुएट्स को परेशानी हुई है, इसलिए इसमें थोड़ा हस्तक्षेप करना जरूरी था।

कोर्ट ने आदेश में कहा है कि एक अप्रैल 2027 के बाद होने वाली भर्ती परीक्षाओं के उम्मीदवारों पर यह नया नियम लॉगू होगा। उनके पास परीक्षा में बैठने के लिए कम से कम एक वर्ष की वकालत का अनुभव होना चाहिए। इस अनुभव का सत्यापन प्रमाणपत्र जारी करके किया जाएगा, जो तबतक जारी नहीं किया जाएगा जबतक कि उम्मीदवार की प्रभावी न्यायिक कार्यवाही में उपस्तिथि और भागीदारी न्यायालय द्वारा निर्धारित तंत्र के अनुसार विधिवत दर्ज नहीं हो जाती।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को संबंधित हाई कोर्ट से परामर्श कर नियमों में आवश्यक संशोधन करने का निर्देश दिया है। ये प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करनी होगी। कोर्ट ने ये भी कहा है कि ये व्यवस्था स्थाई रूप से अपरिवर्तनीय नहीं है।

पांच वर्ष तक इसे लॉगू रखने के बाद भर्ती की गुणवत्ता, प्रशिक्षण, क्लर्कशिप और न्यायिक अधिकारियों के प्रदर्शन के आधार पर इसकी समीक्षा की जाएगी। इसे कोर्ट के समक्ष विचार के लिए रखा जाएगा और जरूरत होने पर इसकी पुन: समीक्षा होगी।

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