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सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट जजों को हाई कोर्ट पद के लिये 'Judicial Office' नहीं माना

महाराष्ट्र के सात फैमिली कोर्ट जजों ने अपने पद को अनुच्छेद 217(2)(a) के तहत 'Judicial Office' मानने की मांग की, जिससे वे हाई कोर्ट जज बन सकें। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने याचिका खारिज कर दी, यह कह कर कि पूर्वनिर्णयों ने इस प्रश्न को स्पष्ट कर दिया है और नई कोई तथ्यात्मक स्थिति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य में पद संरचना में परिवर्तन की जरूरत है तो वह नीति स्तर पर विचार किया जा सकता है।

1 सितंबर 2026 को 07:32 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट जजों को हाई कोर्ट पद के लिये 'Judicial Office' नहीं माना

सौजन्य से:- Navbharat Times

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पूरा मामला क्या है?

महाराष्ट्र के सात फैमिली कोर्ट के जजों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। लाईव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार उनकी मुख्य मांग थी कि फैमिली कोर्ट के जज के पद को Article 217(2)(a) के लिए 'Judicial Office' माना जाए, ताकि वे हाई कोर्ट जज के रूप में नियुक्ति की संवैधानिक पात्रता के दायरे में आ सकें।याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील आर बसंत ने दलील दी कि महाराष्ट्र में पिछले करीब 36 वर्षों से फैमिली कोर्ट जजों की नियुक्तियां न्यायिक सेवा से हो रही हैं और बदली हुई वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए पुराने फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने कहा कि Article 217 के इस सवाल पर पहले ही स्पष्ट निर्णय मौजूद है।

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‘Judicial Office’ क्यों महत्वपूर्ण है?

दरअसल, संविधान का Article 217 हाई कोर्ट जज की नियुक्ति के लिए योग्यता निर्धारित करता है। Article 217(2)(a) के तहत व्यक्ति की पात्रता का एक रास्ता यह है कि उसने भारत के क्षेत्र में कम से कम दस वर्ष तक 'Judicial Office' संभाला हो। इसी शब्द की व्याख्या इस विवाद का केंद्र है। यानी विवाद सिर्फ यह नहीं था कि फैमिली कोर्ट जज न्यायिक काम करता है या नहीं। असली संवैधानिक सवाल यह था कि क्या फैमिली कोर्ट का जज का पद Article 217 के विशेष अर्थ में 'Judicial Office' है?CJI सूर्यकांत की बेंच ने खारिज की याचिका, बतायी वजह

- याचिकाकर्ताओं की ओर से Rejanish v. Deepa फैसले का भी हवाला दिया गया। दलील यह थी कि उस फैसले ने फैमिली कोर्ट जज से जुड़े कुछ रास्तों में मौजूद अयोग्यता को प्रभावित किया है और इससे पुराने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार का आधार बनता है।

- लेकिन CJI सूर्यकांत की बेंच ने स्पष्ट किया कि Rejanish फैसले ने Article 217 की व्याख्या वाले सवाल को तय नहीं किया है। इसलिए केवल Rejanish के आधार पर S.D. Joshi के ratio को दोबारा खोलने का आधार नहीं बनता।

- CJI सूर्यकांत ने यह भी पूछा कि यदि पुराने फैसले को ही देखना है तो ऐसी कौन-सी नई कानूनी या तथ्यात्मक स्थिति सामने आई है, जो पुराने निर्णय की संवैधानिक व्याख्या को बदलने के लिए पर्याप्त हो।

- इसके विपरीत महाराष्ट्र में अलग फैमिली कोर्ट कैडर होने को कोर्ट ने विवाद की जड़ के रूप में देखा। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि समस्या अलग कैडर की संरचना से पैदा हो रही है, तो राज्य सरकार और संबंधित हाई कोर्ट आपसी विचार-विमर्श से नियमों में बदलाव पर नीति स्तर पर विचार कर सकते हैं।

- पीठ के अनुसार किसी पुराने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की समीक्षा या उसे वापस लेने के लिए Article 32 की रिट पेटीशन उपयुक्त कानूनी रास्ता नहीं है। फिर अंततः याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि इसका मूल उद्देश्य S.D. Joshi फैसले की समीक्षा कराना है।

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