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सिंधु जल संधि: पाकिस्तान के सामने भारत की 'कानूनी घेराबंदी', अदालतें भी बेबस

पाकिस्तानी सेना के पूर्व ब्रिगेडियर डॉ. राशिद वली जंजुआ का कहना है कि सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान के सामने कानूनी विकल्प लगभग खत्म हो गए हैं और भारत के सामने वह बेबस है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय अदालतों में भी पाकिस्तान की अर्जी नहीं टिकेगी।

15 अगस्त 2026 को 10:55 am बजे
सिंधु जल संधि: पाकिस्तान के सामने भारत की 'कानूनी घेराबंदी', अदालतें भी बेबस

सौजन्य से:- Navbharat Times

Indus Water Treaty: पाकिस्तानी अधिकारी ने लिखा 1997 का UN जलमार्ग कन्वेंशन भी कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं देता है क्योंकि न तो पाकिस्तान और न ही भारत ने इसकी पुष्टि की है। एकमात्र कानूनी रास्ता तब खुलता है जब भारत अपनी सहमति दे या UNGA या UNSC भारत को सीधा आदेश दे।

इस्लामाबाद: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने देश में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 14 अगस्त को सिंधु जल संधि पर भारत को गीदड़भभकी दी थी। उन्होंने कहा था कि सिंधु जल का एक एक बूंद पानी पाकिस्तान के लिए रेड लाइन है। लेकिन पाकिस्तानी सेना के पूर्व ब्रिगेडियर डॉ. राशिद वली जंजुआ ने डॉन में लिखे एक लेख में कहा है कि 'सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान भारत के सामने बेबस है और उसके सामने तमाम कानूनी विकल्प खत्म हो चुके हैं।' उन्होंने 24 जून को 'डॉन' में ही लिखे गये एक लेख का हवाला दिया है जिसमें सिंधु जल संधि पर भारत की कानूनी घेराबंदी की बात कही गई थी।

ब्रिगेडियर डॉ. राशिद वली जंजुआ (रिटायर्ड) ने डॉन में लिखा है कि 'पाकिस्तान कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता न्यायालय), इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC), और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में भारत को घेरने में पूरी तरह से नाकाम रहा है।' उन्होंने लिखा है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन जहां पाकिस्तान पहले ही किशनगंगा/रातले परियोजना का मुद्दा उठा चुका है। 2025 में अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र की पुष्टि की लेकिन भारत ने इसका बहिष्कार किया है। समस्या यह है कि भारत ने गैर-कानूनी रूप से संधि को रोक रखा है और भारत के पीछे हटने के कारण मध्यस्थता के फैसले को लागू नहीं किया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय अदालत में क्यों नहीं टिकेगी पाकिस्तान की अर्जी?

डॉ. राशिद वली जंजुआ (रिटायर्ड) ने आगे लिखआ है कि UNHRC के संबंध में चूंकि पाकिस्तान और भारत दोनों ने संबंधित अनुच्छेदों की पुष्टि की है इसलिए कानूनी रास्ता वास्तव में खुला है। लेकिन इस प्लेटफॉर्स से सिर्फ तथ्य-खोज रिपोर्ट और सिफारिशें ही मिल सकती हैं बाध्यकारी आदेश नहीं। भारत इस फैसले को भी नहीं मानेगा। फिर तीसरा रास्ता है इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICJ) और भारत भी ICJ के अधिकार क्षेत्र को सशर्त स्वीकार करता हैजिसमें ऐसे देशों के साथ विवाद शामिल नहीं हैं जो कॉमनवेल्थ के सदस्य हैं या रहे हैं लेकिन यहां भी पाकिस्तान भारत पर प्रेशर नहीं डाल सकता है।

उन्होंने लिखा है कि 1997 का UN जलमार्ग कन्वेंशन भी कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं देता है क्योंकि न तो पाकिस्तान और न ही भारत ने इसकी पुष्टि की है। एकमात्र कानूनी रास्ता तब खुलता है जब भारत अपनी सहमति दे या संयुक्त राष्ट्र का कोई अंग जैसे महासभा (UNGA) या सुरक्षा परिषद (UNSC) भारत को सीधा आदेश दे। उन्होंने लिखा है कि ऐसे में कानूनी तौर पर एकमात्र व्यावहारिक रास्ता यह है कि भारत के अड़ियल रवैये के बावजूद IWT की शर्तों के तहत 'परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' (PCA) में यह मुद्दा उठाया जाए।

ICC और UNHRC के दरवाजे भी पाकिस्तान के लिए क्यों बंद हैं?

इसके अलावा पाकिस्तान शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए अंतरिम उपायों की सिफारिश या 'चैप्टर VII' के तहत बाध्यकारी प्रस्ताव की मांग करते हुए UNGA और UNSC में भी यह मामला उठा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पाकिस्तान UNSC में कितना समर्थन जुटा पाता है। उन्होंने अंत में लिखा है यह साफ है कि कानूनी घेराबंदी का रास्ता इतना आसान नहीं है और इसमें कई सीमाएं भी हैं। इसलिए IWT को फिर से मजबूत करने पर पूरी तरह ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानून के भारत द्वारा उल्लंघन का मुकाबला करने के लिए यही सबसे असरदार कानूनी रास्ता रहा है और आज भी है।

लेखक के बारे मेंअभिजात शेखर आजादअभिजात शेखर आजाद नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में इंटरनेशनल अफेयर्स, डिफेंस जर्नलिस्ट हैं। उनके पास अलग अलग न्यूज चैनलों और डिजिटल पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति (International Politics), वैश्विक कूटनीति (Global Diplomacy) और रक्षा रणनीति (Defense Strategy) के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने इन वर्षों में 3 अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-हमास युद्ध, मिडिल ईस्ट, अफगानिस्तान युद्ध, ISIS के खिलाफ संघर्ष, भारत पाकिस्तान संघर्ष जैसे अहम अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं को कवर किया है।

अभिजात शेखर आजाद वैश्विक राजनीति का विश्लेषण करते हैं और भारत पर उसका क्या असर होगा, इसका एनालिसिस करते हुए विश्लेषणात्मक स्टोरी लिखते हैं। इसके अलावा इंटरनेशनल डिफेंस सेक्टर पर उनकी खास नजर होती है। हथियारों की खरीद बिक्री, अंतर्राष्ट्रीय हथियार व्यापार पर वो करीबी नजर रखते हैं। रक्षा जगत में अंदरूनी पहुंच होने की वजह से डिफेंस मामलों पर उनकी सटीक खबरों का काफी प्रभाव है।

विशेषज्ञता- इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के साथ साथ डिफेंस सेक्टर की खबरों के विश्लेषण में अच्छी पकड़। भारतीय वायुसेना और नौसेना और डिफेंस इंटेलिजेंस में पैठ। जियो-पॉलिटिक्स को लेकर अभिजात शेखर आजाद के अनुमान अकसर सही साबित होते हैं। उनकी विशेषज्ञता केवल समाचार रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि वे जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भारतीय दर्शकों के लिए सरल और प्रभावी ढंग से समझाने के लिए जाने जाते हैं। राफेल डील से लेकर अत्याधुनिक मिसाइल टेक्नोलॉजी और वैश्विक शक्ति संतुलन पर सैकड़ों विश्लेषणात्मक लेख।

पत्रकारिता अनुभव: अभिजात शेखर आजाद के पत्रकारिता में करीब 17 सालों का अनुभव है। उन्होंने 2009 से पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरू किया था और उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग में अच्छी पकड़ बनाई। उन्होंने समाचार प्लस और ज़ी मीडिया जैसे संस्थानों में काम किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय से अंग्रेजी पत्रकारिता में स्नातक किया है।

पुरस्कार: अभिजात को ज़ी मीडिया में बेहतरीन लेखन के लिए 'बेस्ट राइटर' अवार्ड मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें दो बार ENBA अवार्ड भी मिला है।

अभिजात के खास इंटरव्यू:

अभिजात शेखर आजाद का 'बॉर्डर-डिफेंस' नाम से साप्ताहिक वीडियो इंटरव्यू आता है, जिसमें वो सैन्य अधिकारियों और डिप्लोमेट्स से बात करते हैं। उन्होंने कई बड़े चेहरे जैसे DRDO के वैज्ञानिक और ब्रह्मोस मिसाइल बनाने वाले वैज्ञानिक अतुल दिनकर राणे, डीआरडीओ वैज्ञानिक हरि बाबू चौरसिया, भारतीय सेना के पूर्व आर्मी चीफ वेद मलिक, लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, लेफ्टिनेंट जनरल संजय वर्मा, एयर मार्शल रवि कपूर, एयर फोर्स अधिकारी विजयेन्द्र के ठाकुर, फाइटर पायलट आरके नारंग, डिप्लोमेट एसडी मुनि, डिप्लोमेट सी उदय भाष्कर, डिप्लोमेट अनिल त्रिगुणायत, डिप्लोमेस रोबिंदर सचदेव, नौसेना कैप्टन श्याम कुमार समेत कई एयरफोर्स और नौसेना अधिकारियों का इंटरव्यू ले चुके हैं।... और पढ़ें

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