शासन की बेरुखी और हुकूमत का खेल
एक समाज में जहाँ न्याय मौन है और सच्चाई को दबाया जाता है, वहाँ मज़हब के नाम पर हिंसा होती है और गरीबी का दंश झेलने वाले लोगों को न्याय नहीं मिलता। यह एक दर्दनाक वास्तविकता है जिसे कवि ने अपनी रचना में उजागर किया है।

सौजन्य से:- Amar Ujala
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अदालत मौन है, और सच यहाँ ज़िंदा जलाया जाता है,
हुकूमत के इशारों पर तमाशा रोज़ नया रचाया जाता है।अजीब दौर है कि भूखे पेट को अब कोई रोटियाँ नहीं देता,
मगर मज़हब के नाम पर हर रोज़ ख़ून बहाया जाता है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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